Luksar Jail: लुकसर जेल में 60 ऐसे बंदी हैं जो जमानत होने के बावजूद छह माह से जेल में रहने के लिए मजबूर हैं। इस बार भी वह दिवाली घर पर नहीं मना पाएंगे। वजह सिर्फ इतनी कि वह अपने जमानती दाखिल नहीं कर पा रहे हैं। कानून में कोई ऐसा प्रावधान नहीं है कि उनको बिना जमानती के छोड़ा जा सके। हालांकि एक साल में लोक अदालत और जिला विधिक प्राधिकरण की ओर से की गई कार्रवाई के बाद 600 बंदियों को इस साल कानूनी मदद देकर जेल से छुड़वाया गया है।
जिले के लुकसर जेल में तीन हजार से अधिक बंदी हैं। इनमें हत्या, लूट और दुष्कर्म समेत गंभीर प्रवृत्ति के 750 अपराधी बंद हैं। जमानती नहीं मिलने के कारण तीन से छह माह से अपनी रिहाई की बाट देख रहे 60 बंदियों ने जेल अधीक्षक से मदद की गुहार लगाई है। एक बंदी ने बताया कि वह चोरी के आरोप में जेल गया था, लेकिन दो माह बाद ही उसे जमानत मिल गई थी। जमानती नहीं मिलने के कारण चार माह बाद से बंद है। वह पश्चिम बंगाल से काम करने आया था और उसे किसी ने धोखे से चोरी का माल दे दिया और उसी के साथ पुलिस ने गिरफ्तार किया था। कोई संपर्क सूत्र नहीं होने के कारण वह घर पर किसी से बात भी नहीं कर पा रहा है।
इसलिए नहीं मिलते जमानती
पूर्व अध्यक्ष सुशील भाटी ने बताया कि सीआरपीसी की धारा-437 कहती है कि आरोपी का बांड भरवाया जाता है और गारंटी ली जाती है कि यदि वह तारीख पर नहीं आता है तो इसकी जिम्मेदारी उनकी होगी। इसके अलावा उनकी जमानत राशि को जब्त कर लिया जाएगा। उनके खिलाफ कोर्ट को कंपलेंट केस दर्ज करने की भी आजादी होती है। इस मामले में आरोपी की जमानत देने वाले पर ही पूरी जिम्मेदारी आ जाती है। कुर्की तक अदालत कर सकती है। इसलिए बिना जान पहचान या गंभीर प्रवृत्ति के अपराधियों को जमानती मिलने में परेशानी होती है।
जमानती के लिए कोई रियायत नहीं
पूर्व सचिव सुनील भाटी ने बताया कि किसी भी आरोपी को अदालत जमानत देती है तो उसके एवज में दो लोगों को जमानती बनवाती है। इसके लिए अदालत गारंटी तो कम कर सकती है, लेकिन जमानती तो देना ही होगा। इसमें अदालत ने कोई छूट नहीं दी है। हालांकि अदालत ऐसे हल्के अपराध के मामलों में जल्द सुनवाई करके उनका निपटारा कर देती है। वह सजा के साथ ही जल्द छूट जाते हैं। कानून ने आरोपी को जमानती के लिए कोई रियायत नहीं दी है।
कोट्सजेल में एक साल में 600 बंदियों को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और लोक अदालत के माध्यम से कानूनी मदद मिली है। वह अपने घर जा सके है। उनको अपनी पैरवी के लिए अधिवक्ता मुहैया कराए गए थे और सरकार ने फीस दी है। इन बंदियों को लेकर भी आला अधिकारियों से मार्गदर्शन मांगा गया है। अरुण प्रताप सिंह, जेल अधीक्षक।