रंगों में खुदा आज दिखा रंग मुबारक, होली है मेरे दोस्त सुना रंग मुबारक... यह पंक्ति उन कई रचनाओं में से एक है, जिन्हें होली के अवसर पर आयोजित विशेष काव्य कैफे में प्रस्तुत किया गया। डिजिटल माध्यम से हुए इस विशेष कार्यक्रम में अनिल शर्मा, तोयेश भाटिया, वैभव दुबे, निधि सिंह, पूनम सोनछात्रा और सूरज मणि ने प्रभावी बोल प्रस्तुत किए। प्रस्तुत हैं काव्य कैफे में पेश की गई कविताओं के अंश:
पंडित अनिल कुमार शर्मा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से हैं। इन्हें मंचों पर 'जगमग' कहकर पुकारा जाता है। इनकी रचना है:
रंग बिखरे हैं दिल मिलाने के लिए
दिल का हर दर्द रंगों में भुलाने के लिए
फूल टेसू के खिले हैं फजा में देखो
खुशबू उठी है होश उड़ाने के लिए
एक एनजीओ के संस्थापक सूरज मणि का असहाय बच्चों व पर्यावरण के प्रति रचा बसा प्रेम उनकी कविताओं में भी झलकता है। होली पर उनकी कविता है:
ज्यादा ऊंचे उठोगे, तो ढह जाओगे
रेत जैसे बिखरके ही रह
जाओगे
मुझको रोने से गर तुमने
रोका नहीं
मेरे आंसू की धारा में बह जाओगे
गाजियाबाद की निधि सिंह पाखी पेशे से मार्केटिंग और और पीआर मैनेजर हैं। सद्भाव से भरी यह कविता उन्होंने प्रस्तुत की:
देखो किस्सा है छुपा कोई नया होली में
उनको एक दूजे से अब प्यार हुआ अब होली में
खिल से जाते हैं ये बिखरे हुए सारे रिश्ते
भूल कर सारा ही शिकवा ओ गिला होली में
झांसी के वैभव दुबे बीएचईएल कानपुर में कार्यरत हैं। रंगों से सराबोर इनकी रचना देखें:
नाच-गाना तेज बोली का मजा कुछ और है
मस्तियां कुछ कम नहीं होती हैं सब के साथ पर
दोस्तों के साथ होली की मजा कुछ और है
रेल मंत्रालय में कार्यरत तोयेश भाटिया की कविताओं में अधिकतर व्यंग्य होता है। काव्य कैफे में यह कविता उन्होंने पेश की:
काहे को करनी होली की कुछ तैयारी
त्योहार नहीं ये है सबसे बड़ी बीमारी
पिछली बार रंगों से ऐसा मुझे सरोबार कर दिया
कि घरवालों तक ने पहचानने से इंकार कर दिया
गणित की शिक्षिका पूनम सोनछात्रा एक नामी स्कूल में कार्यरत हैं। सौहार्द के रंगों से भरी उनकी कविता यह रही:
रंगों में खुदा आज दिखा, रंग मुबारक
होली है मेरे दोस्त सुना, रंग मुबारक
फैला है धनक में तो फूलों में भी बिखरा
जैसे कि खुदा ने कहा हो, रंग मुबारक