दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना की गिनती भाजपा के कद्दावर नेताओं में होती थी। वे 1993-1996 के बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे। दिल्ली को मंदिर और खुद को उसका पुजारी मानने वाले मदन लाल खुराना ने इसको सजाने-संवारने में बड़ी भूमिका अदा की। दिल्ली में भाजपा को खड़ा करने व आधुनिक दिल्ली की बुनियाद रखने वाले खुराना राजनेता से ज्यादा वास्तुकार थे।
पाकिस्तान के फैसलाबाद में 15 अक्तूबर, 1936 को पैदा हुए मदन लाल खुराना भारत-पाक विभाजन के वक्त सपरिवार दिल्ली आकर बस गए। वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संसदीय कार्यमंत्री और पर्यटन मंत्री भी रहे। चार बार सांसद चुने गए। 2001 में उन्हें राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया था, लेकिन जनवरी 2004 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया।
1993 में सत्ता हासिल करने के लिए खुराना ने दिल्ली के मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली। हालांकि, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके थे, लेकिन तीन साल की अल्पावधि में ही उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिन्हें शायद ही कोई भुला सके। दिल्ली को उनकी सबसे बड़ी देन मेट्रो है। दिल्ली मेट्रो की वित्तीय व्यवस्था समेत दूसरी रणनीति बनाने में उनकी भूमिका रही।
बाद में जब उन्हें दिल्ली मेट्रो का चेयरमैन बनाया गया, तो मेट्रो के रूट तय करने तक में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा सीलिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सरीखे संकट के वक्त वह दिल्ली की आवाज बनते रहे। 1998 में दिल्ली में भाजपा की करारी हार के बाद उन्होंने कहा कि ‘मेरी तो बगिया ही उजड़ गई’।
कामकाज में गंभीर होने के साथ वह काफी हंसमुख भी थे। अनौपचारिक बातचीत में वह ऐसी चुटीली कहानियां सुनाते, जिससे लोग अपनी हंसी नहीं रोक पाते थे। मदन लाल खुराना के पुत्र व भाजपा प्रवक्ता हरीश खुराना ने बताया कि चुनावी माहौल में वह कहते थे कि हम नेताओं को तो रात सपने में भी वोट मांगना ही याद आता है।
सुबह एक बार नींद से उठाने पर कहा कि बहनजी, दिल्ली को बनाना है तो वोट देना। हरीश खुराना कहते हैं कि पिता जी की बीमारी के बाद 2008 से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हुआ। अक्तूबर 2018 में आखिरी सांस लेने तक वह दिल्ली के बारे में ही फिक्रमंद रहे।