बावली के बाहर लगा शिलापट
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- इस बावली के नीचे तक पहुंचने के लिए करीब 103-105 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं।
- पुराने जमाने में पानी को बचाने के लिए इस तरह की बावली को बनाया जाता था।
- एक समय में दिल्ली और पुरानी दिल्ली के लोग यहां तैराकी सीखने के लिए आते थे।
- एक समय बावली का कुआं काले रंग के पानी से भरा हुआ था।
- यह काला पानी यहां आने वाले लोगों को सम्मोहित कर आत्महत्या के लिए उकसाता था।
- इस बावड़ी में 'पीके', 'झूम बराबर झूम' समेत कई बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।
- यह दिल्ली की उन गिनी-चुनी बावलियों में से एक है, जो अभी भी अच्छी स्थिति में हैं।
- इसके स्थापत्य में ‘व्हेल मछली की पीठ के समान’ छत है।
भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार के नक्शे के अनुसार 1868 में इस स्मारक का निर्माण ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया था – इस स्मारक को ‘ओजर सेन की बोवली’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। वहीं बावली के बाहर लगे शिलापट पर इसका नाम 'उग्रसेन की बावली' लिखा हुआ है।
बावली के पश्चिमी कोने में एक छोटी सी मस्जिद भी बनी है। इस मस्जिद के स्तंभों में कुछ ऐसे विशेष लक्षण और रंग रूप उभरे हुए हैं, जो बौद्ध काल की कुछ असाधारण संरचनाओं से मेल खाते हैं।
बावली के शून्य शांत वातावरण में पत्थर की ऊंची-ऊंची दीवारों के बीच जब कबूतरों की गुटरगूँ और चमकादड़ों की चीखें और फड़फड़ाहट गूंजती है, तो बावली का माहौल पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर देता है। कई बार तो यहां आने वालों ने किसी अदृश्य साया को भी महसूस किया है।
कुछ वर्षों पहले तक यह बावली बहुत चर्चित तो नहीं थी, लेकिन आमिर खान की फिल्म 'पीके' की शूटिंग के बाद प्रेमी जोड़ों और टूरिस्टों के बीच यह खूब पसंद की जाने वाली जगह बन गई। अब यहां आने-जाने वालों की अच्छी-खासी संख्या है।