देश की राजधानी दिल्ली में जहां बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की योजनाएं बन रही हैं, वहीं उत्तर पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र के बदरपुर खादर गांव के करीब 4,000 लोग आज भी बिजली, पानी, स्वास्थ्य और सार्वजनिक परिवहन जैसी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
संसद से महज 20 किलोमीटर और विधानसभा से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर बसे इस गांव में हालात ऐसे हैं कि पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है, बिजली के लिए दूसरों के घरों का सहारा लेना पड़ता है और बीमार होने पर इलाज के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है। ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर उन्हें अपने हिस्से की बुनियादी सुविधाओं के लिए कब तक इंतजार करना होगा?
बदरपुर खादर में पानी की पाइपलाइन तो बिछाई गई है, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक आज तक घरों के नलों में पानी नहीं पहुंचा। ऐसे में लोगों को टैंकरों के भरोसे अपनी जरूरतें पूरी करनी पड़ती हैं। गर्मियों में पानी की किल्लत और बढ़ जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि जब गांव में पाइपलाइन मौजूद है तो नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करने में देरी क्यों हो रही है?
गांव में बिजली की व्यवस्था भी लोगों के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ घरों में ही बिजली के मीटर लगे हैं, जबकि बाकी परिवार दूसरे घरों से बिजली लेकर काम चलाते हैं। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त पैसे भी चुकाने पड़ते हैं। इसका असर बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के घरेलू कामों पर पड़ता है। ग्रामीण चाहते हैं कि हर परिवार को अपना वैध बिजली कनेक्शन मिले, ताकि दूसरों पर निर्भरता खत्म हो सके।
चार हजार की आबादी, स्वास्थ्य केंद्र नहीं
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या डिस्पेंसरी नहीं होने से लोगों को सामान्य बीमारियों के इलाज के लिए भी बाहर जाना पड़ता है। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह परेशानी और बढ़ जाती है। रात में किसी मरीज की तबीयत बिगड़ने पर अस्पताल पहुंचाना भी चुनौती बन जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या डिस्पेंसरी खुलने से उन्हें बड़ी राहत मिल सकती है।
बस के लिए पांच किलोमीटर का सफर
सार्वजनिक परिवहन की सुविधा नहीं होने से नौकरीपेशा लोगों और विद्यार्थियों को रोजाना परेशानी उठानी पड़ती है। ग्रामीणों के मुताबिक, गांव तक बस सेवा नहीं पहुंचती और ऑटो व ई-रिक्शा भी नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए करीब पांच किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। इसके बाद ही बस या दूसरे सार्वजनिक परिवहन के साधन मिल पाते हैं।
ग्रामीणों की जुबानी, उनकी परेशानी
गांव में पानी की पाइपलाइन बिछी है, लेकिन नलों में आज तक पानी नहीं आया। टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। गर्मियों में स्थिति और खराब हो जाती है। प्रशासन को नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए।
-शरीक
बिजली के मीटर कुछ ही घरों में लगे हैं। बाकी परिवारों को दूसरों से बिजली लेकर काम चलाना पड़ता है और इसके लिए ज्यादा पैसे भी देने पड़ते हैं। हर घर तक वैध बिजली कनेक्शन पहुंचना चाहिए।
-शब्बो
पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। दिल्ली में रहते हुए भी गांव के हालात किसी दूरदराज क्षेत्र जैसे हैं। प्रशासन को इस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
-फरहाद चौहान
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। किसी की तबीयत खराब होने पर बाहर जाना पड़ता है। रात में मरीज को अस्पताल ले जाना बेहद मुश्किल हो जाता है। एक डिस्पेंसरी खुल जाए तो बड़ी राहत मिलेगी।
-राकेश कुमार