गर्भवती महिलाओं पर ठीक से नजर रखें तो जन्म के बाद नवजात को हेपेटाइटिस-बी से बचाया जा सकता है। दिल्ली सरकार के यकृत एवं पित्त विज्ञान संस्थान (आईएलबीएस) के अध्ययन से इसका पता चला। आईएलबीएस ने पांच साल तक दिल्ली में दो लाख गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग की।
इस दौरान करीब दो फीसदी महिलाएं हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित मिलीं। संस्थान से पीड़ित महिलाओं का चयन कर डिलीवरी तक उन पर नजर रखी। डिलीवरी के बार उनके नवजात को 14 सप्ताह में चार बार हेपेटाइटिस-बी से बचाव के लिए टीके लगाए गए। टीके लगाने के बाद सभी बच्चों की निगरानी की गई। लंबे अंतराल के बाद बच्चों की जांच की गई। इस जांच में 99.9 फीसदी बच्चों में हेपेटाइटिस-बी के खिलाफ एंटीबॉडी पाई गई। इस एंटीबॉडी की मदद से बच्चा भविष्य में रोग से लड़ पाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पूरे देश में इसी प्रोटोकॉल को अपनाया जाता है तो देश से हेपेटाइटिस-बी को खत्म करने का लक्ष्य जल्द हासिल कर लेंगे। संस्थान के विशेषज्ञों ने इससे संबंधित रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपी है। साथ ही सिफारिश की है कि हर राज्य में ऐसा प्रोटोकॉल बनाना चाहिए। आईएलबीएस में आणविक एवं कोशिकीय चिकित्सा विभाग की प्रोफेसर डॉ. निरुपमा त्रेहनपति ने कहा कि यदि समय पर गर्भवती महिलाओं की जांच कर हेपेटाइटिस बी के मामले पकड़ ले तो जन्म के बाद बच्चे को टीकाकरण देकर रोग से बचा सकते हैं। इसके लिए पूरे देश में व्यवस्था बनानी होगी।
2 फीसदी महिलाओं में मिला है रोग
डॉक्टरों कि माने तो आंकड़े बताते है कि भारत में करीब दो फीसदी गर्भवती महिलाएं हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित पाई जाती हैं। इनकी पहचान के लिए शुरुआती के तीन माह में अनिवार्य रुप से एचबीवी की जांच की जानी चाहिए। शुरूआत में पहचान होने से बच्चे को इस रोग से बचाया जा सकता है।
सुरक्षित रहे वैक्सीन
डॉक्टरों ने कहा कि वैक्सीन में प्रोटिन होता है। इसे सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त तापमान में रखना होता है। इसे सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त संख्या में कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था होनी चाहिए। यह वैक्सीन बच्चों को अन्य वैक्सीन के साथ ही तय समय में दी जानी चाहिए।
गरीब राज्यों में नहीं है सुविधा
डॉक्टरों का कहना है कि देश के कई राज्यों में स्क्रीनिंग, निगरानी, डिलीवरी के बाद नवजात के टीकाकरण की पर्याप्त सुविधा नहीं है। सरकार को इसे बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।
नहीं दिखता कोई लक्षण
हेपेटाइटिस-बी का शुरुआती दौर में कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। यह एक ब्लड का वायरस है। यह मां से बच्चे को, खून चढ़ाने के दौरान, यौन संबंध बनाने के समय होने की आशंका रहती है। कुछ मामलों में सलाइवा से भी होने की आशंका रहती है, लेकिन इसके केस काफी कम हैं।