के. श्रीनिवासराव
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हिंदी के लिए जितना करें कम लगता है। मुझे लगता है कि हिंदी भाषा की वजह से देश की एकता बरकरार है। मेरी मातृभाषा तेलुगु है, लेकिन अपनी हिंदी समझ के कारण मैं दिल्ली में टिक पाया हूं। पिछले 7 वर्षों से साहित्य अकादमी से जुड़े रहने के दौरान मैं हिंदी पुस्तकों का प्रकाशन दो गुना कर पाया हूं। इस दौरान हिंदी किताबों की बिक्री 3 गुना बढ़ गई है।
इसके अलावा साहित्य अकादमी साल भर चेन्नई, त्रिवेंद्रम और उत्तर-पूर्वी राज्यों में लगातार हिंदी भाषा से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन करा रहा है। यह बताना भी जरूरी है कि साहित्य अकादमी के पुस्तकालय में देश की 24 क्षेत्रीय भाषाओं की लगभग ढाई लाख किताबें होंगी। जिसमें से 30 हजार से अधिक किताबें केवल हिंदी की हैं। साहित्य अकादमी साल भर में लगभग 30 भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं की बेहतरीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद कराता है। क्योंकि हिंदी के पाठक ज्यादा हैं। मौजूदा समय हिंदी केवल हिंदी प्रदेश की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की भाषा बन चुकी है। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से चलाए जा रहे 'हिंदी हैं हम' अभियान के तहत बातचीत के दौरान साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने यह बातें कहीं।
के. श्रीनिवासराव ने कहा कि साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त मूल रूप से मलयाली साहित्यकार प्रो. अरविंदाक्षन हिंदी के अध्यापक हैं। इसी तरह मूलत: तेलुगु भाषी प्रो. शेषारत्नम और प्रो. लक्ष्मी प्रसाद हिंदी भाषा के प्रोत्साहन कार्यों के लिए साहित्य अकादमी की ओर से पुरस्कृत किए जा चुके हैं। कुल मिलाकर देश के अंदर हिंदी बहुत ही ड मजबूत जगह पर है।
के. श्रीनिवासराव ने कहा कि हिंदी रोजगार की भाषा बन चुकी है। दक्षिण और उत्तर-पूर्व भारत में आज बड़ी संख्या में लोग हिंदी में बात करते हैं। यदि हिंदी बोलनी आती है तो देश में कहीं भी रोजगार मिल सकता है। इसके साथ ही हिंदी अंतर्राष्ट्रीय भाषा भी बन चुकी है। आज दुनिया के 140 देशों में हिंदी पढ़ाई जाती है। यह बताना जरूरी है कि मौजूदा समय जेएनयू में बड़ी संख्या में चीनी छात्र हिंदी सीख रहे हैं। क्योंकि हिंदी बाजार और व्यापार की भाषा बन चुकी है। अब वह दिन दूर नहीं है जब संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा की मान्यता देनी पड़ेगी।