सुप्रीम कोर्ट दिल्ली नगर निगम में 10 सदस्यों को मनोनीत करने की उपराज्यपाल की शक्ति को चुनौती देने वाली दिल्ली सरकार की याचिका पर आठ मई को सुनवाई करेगा। उपराज्यपाल के कार्यालय ने सुनवाई स्थगित करने की मांग वाला एक पत्र शीर्ष अदालत में पेश किया था।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने इस तथ्य पर गौर करने के बाद अगली सुनवाई आठ मई तय कर दी। एलजी कार्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील एएम सिंघवी पेश हुए। शीर्ष अदालत ने पहले मौखिक रूप से कहा था, उपराज्यपाल (एलजी) एमसीडी में 10 सदस्यों को नामित करने में मंत्रिपरिषद की ‘सहायता और सलाह के बिना’ कैसे कार्य कर सकते हैं। इससे पहले उसने 10 सदस्यों के नामांकन को रद्द करने की दिल्ली सरकार की याचिका पर नोटिस जारी किया था।
मेहता ने कहा, संबंधित संशोधन के लिए अधिसूचना जारी की गई है। यह अधिसूचना एक अन्य याचिका में विचाराधीन है। उन्होंने कहा इस मामले हलफनामे के माध्यम से जवाब दाखिल किया जाएगा। सिंघवी ने मेहता के जवाब का विरोध करते हुए इसे गलत बताया। उन्होंने कहा, अनुच्छेद 239एए को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सांविधानिक व्याख्या को संशोधन के जरिये नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया था कि दिल्ली सरकार के अधिकारियों का हौसला बढ़ा है क्योंकि वे फाइलें दिल्ली सरकार के साथ साझा किए बिना सीधे उपराज्यपाल के कार्यालय में भेज रहे हैं। इस तरह हर बार हमें राहत के लिए कोर्ट आना पड़ रहा है और वे सत्ता का आनंद ले रहे हैं। कानून सांविधानिक व्याख्या को नहीं बदल सकता। दिल्ली सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सख्ती पारित की जानी चाहिए।