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सेना के जांबाज भाई ने 14 कश्मीरी बहनों को आतंकियों के चंगुल से छुड़ाया था

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गुरुग्राम। जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब कृष्ण ने उनकी रक्षा की थी। तभी तो कहते हैं भाई हो तो कृष्ण जैसा। ऐसे ही देश के वीर जांबाज भाई गुरुग्राम के पालम विहार में रहते हैं, जिन्होंने 14 कश्मीरी बहनों को आतंकियों के चंगुल से अपनी जान की बाजी लगाकर छुड़ाया था। देश के ऐसे पहले ब्रिगेडियर जिन्हें व्हीलचेयर पर होने के बावजूद मेजर जनरल के पद पर प्रमोशन मिला। बहादुरी के लिए कीर्ति चक्र भी मिला।
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मेजर जनरल सुनील राजदान (अवकाश प्राप्त) ऐसा ही एक नाम है। कश्मीर में आतंकियों के साथ हुए 16 घंटे के ऑपरेशन के दौरान उनके पेट में गोलियां लगीं। रात भर खून बहता रहा। उन्होंने कश्मीर के नंदकानूर में किए सैन्य अभियान में 14 से 30 वर्ष की उन 14 लड़कियों को जान की बाजी लगाकर बचाया था, जिन्हें लश्कर के आतंकियों ने बंधक बनाकर रखा था और उनका यौन शोषण कर रहे थे।
अपने बारे में वे कहते हैं कि राष्ट्रयज्ञ में सभी आहुतियां पूर्ण रूप से जलती नहीं हैं .. कुछ अधूरी रह जाती हैं। मैं वही अधूरी आहुति हूं।
वे बताते हैं कि 7 अक्तूबर 1994 की शाम वह कश्मीर के पुलवामा में तैनात थे। शाम को एक दुकान में चाय पी रहे थे, तभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के कंपाउंडर ने आकर बताया कि उसकी छोटी बेटी को आतंकी उठाकर ले गए हैं। यह सुनते ही मेजर अपने कैंप पहुंचे और वरिष्ठ अधिकारियों से बच्चियों को छुड़ाने की इजाजत मांगी। अधिकारियों की इजाजत मिलते ही दूसरे दिन यानी 8 अक्तूबर को हम उस जगह की ओर निकल पड़े, जहां आतंकियों के छिपे होने की बात बताई गई थी।
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मेजर बताते हैं कि उस जगह पहुंचने पर उन्होंने महसूस किया कि कहीं से देसी घी में खाना बनने की खुशबू आ रही है। आम तौर पर कश्मीरी सरसों के तेल में खाना बनाते हैं। हम चुपके से लकड़ी रखी जगह यानी घर के दाहिनी ओर रसोई में गए। एक महिला थी जिसे समझाया कि हम आतंकी नहीं हैं और मिलिट्री से हैं। इसके बाद उस मकान को चारों ओर से घेर लिया गया। मेजर ने बताया कि वह दो जवानों के साथ रसोई में गया। ऊपर का जो दृश्य था, हम बता नहीं सकते। गोली की आवाज सुनकर बाहर खड़े हमारे जवानों को लगा कि उन्होंने मुझे मार दिया है। अंधेरा था, फिर सुबह 3 बजे दो आतंकी और नीचे आए, जिन्हें हमने बंधक बनाया, मगर मेरे पेट में गोली लग गई थी जो रीढ़ के अंदर घुस गई थी। खून रोकने के लिए पटका बांधा था, मगर खून रुक नहीं रहा था। हॉस्पिटल पहुंचने तक मेजर ने खुद ही 16 ड्रिप चढ़ाए।
बेटियां असुरक्षित हो यह होने नहीं दे सकता था
मेजर बताते हैं कि वह खुद भी कश्मीरी हैं। शरीर में जान रहते बहन, बेटियां असुरक्षित हो यह होने नहीं दे सकता था। इस ऑपरेशन के लिए सुनील राजदान को कीर्ति चक्र मिला, मगर रीढ़ की हड्डी तक गोली जाने के कारण वह व्हीलचेयर पर आ गए। इसके बावजूद सैन्य अभियानों में हिस्सा लेते रहे। सेवानिवृत्त के बाद वे गुरुग्राम में रहते हैं।
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