नूंह शहर में कर्फ्यू लगा हुआ है। हालांकि तीन घंटों के लिए कर्फ्यू में ढील दी जा रही है, लेकिन लोगों को सब्जी और दवाई की परेशानी हो रही है। सब्जी वाले गलियों में नहीं आते। सरकारी अस्पताल में सिर्फ इमरजेंसी खुली है। पांच दिन से ओपीडी नहीं लगी है।
जलाभिषेक यात्रा के दौरान 31 जुलाई को हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद से ही नूंह शहर में कर्फ्यू लगा हुआ है। ऐसे में शहर के लोग दवा और सब्जी को तरसने लगे हैं। प्रशासन की ओर से प्रतिदिन तीन घंटे के लिए कर्फ्यू में ढील दी जाती है, मगर अभी अनहोनी की आशंका से सब्जी मंडी में दुकानदार नहीं पहुंच रहे।
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गलियों में सब्जी बेचने वाले भी पांच दिनों से अपने-अपने घरों में ही दुबके पड़े हैं। सरकारी अस्पताल में भी ओपीडी दंगे के बाद से शुरू नहीं हो पाई है। बीती 31 जुलाई को नूंह के नल्हड़ में शुरू हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद से शहर का माहौल पांच दिन बाद भी पटरी पर वापस नहीं लौट पाया है।
बीते दो दिनों से नूंह के शहरी इलाके से हालांकि किसी प्रकार की घटना नहीं हुई है, मगर लोग अभी भयभीत हैं। ऐसे में कोई घर से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। दूसरी ओर प्रशासन भी व्यवस्था सुधार को लेकर अभी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुआ है। यही कारण है कि इस हिंसा के बाद से ही प्रशासन ने शहर में कर्फ्यू लगा रखा है।
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कर्फ्यू में दी जाती है ढील, मगर नहीं खुलती दुकानें
बीते तीन दिनों से कर्फ्यू में ढील दी जा रहा है। पहले दिन दो घंटों की ढील दी गई थी। अब इस समय सीमा को बढ़ाकर तीन घंटे कर दिया गया है। आवश्यक वस्तुओं की खरीद-फरोख्त के लिए प्रशासन द्वारा यह ढील दी जा रही है, मगर लोगों को पूरा राशन तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा। दरअसल हिंसा के बाद से ही लोग इस कदर घबराए हुए हैं कि कोई रिस्क ही नहीं लेना चाहता।
यही कारण है कि कर्फ्यू में ढील के बावजूद ज्यादातर दुकानदार अपनी दुकान खोल ही नहीं रहे। सबसे बुरा हाल सब्जी मंडी का है। हिंसा वाले दिन से ही सब्जी मंडी वीरान पड़ी हुई है। जबकि आम दिनों में यहां खासी भीड़ रहती है। इक्का-दुक्का दुकान खुली भी हैं, मगर ज्यादातर ग्राहक मंडी तक पहुंचे ही नहीं।
गलियों में भी नहीं पहुंच रहे सब्जी वाले
गलियों में फेरी लगाकर फुटकर सब्जी बेचने वाले भी हिंसा के बाद से गायब हो गए हैं। लोगों का कहना है कि मंडी जाकर सब्जी लाने के हालात अभी नहीं हैं। वैसे भी मंडी में ज्यादातर दुकानें बंद ही हैं। नूंह में हिदायत कालोनी की रहने वाली मैमुना ने बताया कि सब्जी मंडी में सिर्फ आलू-प्याज ही मिलता है। हरी सब्जी मिल ही नहीं पाती।
मेडिकल स्टोर बंद, पांच दिन से नहीं खुली सरकारी अस्पताल की ओपीडी
हिंसा वाले दिन से ही क्षेत्र में सबसे ज्यादा चिकित्सा सेवा प्रभावित हुई है। कर्फ्यू में ढील के दौरान यहां चंद राशन की दुकानें ही खुलती हैं। अन्य दुकानें पूरी तरह से बंद ही रहती हैं। इनमें निजी डाक्टर और मेडिकल स्टोर भी शामिल हैं। बीते दो दिनों से प्रशासन द्वारा की गई तोड़फोड़ की कार्रवाई के दौरान भी कई मेडिकल स्टोर पर पीला पंजा चल चुका है।
सरकारी अस्पताल की ओपीडी भी बीते पांच दिनों से पूरी तरह से बंद है। यहां सिर्फ इमरजेंसी में ही मरीजों को इलाज उपलब्ध है। मालब गांव निवासी जुबैर और दिहानी के जमशेद ने बताया दवा के लिए बड़ी ही मशक्कत करनी पड़ रही है। जमेशद का कहना है कि बेटे के लिए एक इंजेक्शन के लिए मेडिकल स्टोर संचालक की बड़ी मिन्नत करनी पड़ी।
एक दिन बंद रही थी दूध की सप्लाई
दूध के लिए भी नूंह शहर के लोगों को एक दिन तरसना पड़ा था। दंगे से अगले दिन नूंह में दूध की सप्लाई पहुंच ही नहीं पाई थी। हालांकि इसके अगले ही दिन से बल्लभगढ़ से वीटा बूथ पर दूध की सप्लाई शुरू हो गई थी।