गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन की रिवर हाइट्स सोसायटी में शनिवार शाम अमर उजाला काव्य कैफे का आयोजन किया गया। एओए से सहयोग कर आयोजित कवि सम्मेलन में नामचीन कवियों ने ओज, हास्य, शृंगार व व्यंग की कविताएं सुनाकर लोगों को हंसी से लोटपोट कर दिया।
सम्मेलन की शुरुआत मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और पुष्प अर्पित करने के साथ हुई। मंच का संचालन कवि एवं शायर राज कौशिक ने किया। मंच पर मौजूद कवियों में अनिमेष शर्मा, रजनीश राज, ममता लड़ीवाल, ऋचा सूद, डा. अल्पना सुहासिनी, सुरेंद्र शर्मा, मोहित शौर्य, डा. नितिन गुप्ता रहे।
गजलकार सुरेंद्र शर्मा ने बढ़ती महंगाई की ओर श्रोताओं का ध्यान खींचते हुए कविता सुनाई, जहां हो झूठ की सत्ता वहां सच कौन बोलेगा, चरम महंगाई में चीजें सही से कौन तोलेगा, ये अच्छा है वो अज आती बिना दस्तक दिए आती, बताकर मौत गर आए किवाड़ें कौन खोलेगा। कवियों के अलावा सोसायटी निवासियों ने भी मंच से कविता पढ़ी। इनमें कैप्टन गोपाल सिंह, डॉ. कामाक्षी, डॉ. भारती, रेशु अग्रवाल ने काव्यपाठ कर श्रोताओं की तालियां लूटीं।
लोगों ने किया धन्यवाद
मंच पर आसीन कवियों ने अमर उजाला के प्रति धन्यवाद किया और कहा हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने में अमर उजाला अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। हिंदी भाषा में जो समरसता है वह और किसी भाषा में नहीं है। इस मौके पर रिवर हाइट्स एओए की ओर से सुबोध त्यागी, प्रिंस त्यागी, संदीप गुप्ता, शशि देव द्विवेदी, रितेश अग्रवाल, विजय श्रीवास्तव, भूपेंद्र भारद्वाज, सचिन त्यागी, राजकुमार त्यागी, शशि कुमार द्विवेदी, रितेश अग्रवाल, विजय श्रीवास्तव, परीक्षित पहल, रोहित जैन, विनोद उपाध्याय समेत सोसायटी के अन्य लोग मौजूद रहे।
कवियों ने पढ़ी ये रचनाएं
अनिमेष शर्मा आतिश
ग़ज़ल ग़ज़ल न रही शे''''''''''''''''र सरफिरे निकले
किताबें इश्क में सब हर्फ़ दोगले निकले
रहे तो ऐसे के दो जिस्म एक जान हैं हम
दिलों के बीच मगर कितने फ़ासले निकले।
सुरेंद्र शर्मा
बिछुड़ने का बहाना चाहता है,
वो मुझसे दूर जाना चाहता है।
गले कुछ इस तरह मुझसे मिला है,
वो जाके फिर न आना चाहता है।
ऋचा सूद
रिश्तों की थाल
और मैं इस थाल से उस थाल में परोसी जाती रही,
कभी स्वाद लगी तो खा ली गई
और नहीं तो बासी कहकर फेंकी जाती रही ....
मत फेंकना उन पन्नों को जिनपर मेरी गुड़िया ने अपने जीवन की पहली लकीरें खींची थी...।
ममता लड़ीवाल
पायल झुमके दिल को खूब लुभाते हैं
इनपर अक्सर लड़कों के दिल आते हैं।
जींस पहनने में कोई भी हर्ज़ नहीं
गीत दुपट्टे पर ही लिक्खे जाते हैं...।
रजनीश राज :
तुम अपने ज़ुल्म से अभी थकते हो किसलिए,
होने दो इन्तिहा मेरे सब्र-ओ- क़रार की।
मैं तेरा कोई ''''''''''''''''राज़'''''''''''''''' ग़ज़ल में छुपा सकूं,
ये बात ही कहां है मेरे इख़्तियार की।
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डा. अल्पना सुहासिनी
तेरे मेरे लब की बात, कैसे बन गई सबकी बात,
फिर पंचायत बैठ गई, होगी बेमतलब की बात
हमको इतनी आस बहुत है,अतर्मन में प्यास बहुत है,
बांट सको तो खुशियां बांटों, गम तो सबके पास बहुत है।
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डा. नितिन गुप्ता
ख़ुशी का हाथ थामे ग़म के साथी हो लिए होते।
जो दिल को प्यार के कुछ टेसुओं से धो लिए होते।
बिना सीखे तज़ुर्बा दर्द का हंसना नहीं आता।
ख़ुशी दुगुनी सी लगती ग़र ज़रा सा रो लिए होते।
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राज कौशिक
गिराएगा किसी को जो कभी खुद भी गिरेगा वो
जो भी हम दे रहे जिसको, हमें वापस मिलेगा वो
पता था प्यार में पागल बना कर ही वो छोड़ेगा
नहीं मालूम था पागल बना कर छोड़ देगा वो
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मोहित शौर्य
खिला उजड़े चमन में था मगर में फूल ताजा हूं,
यह छोटी सी उम्र में ही मैं सदियों का तकाजा हूं।
हवा के चंद झोंके क्या मेरी हस्ती मिटायेंगे,
गमों की गोद में खेला अभावों का मैं राजा हूं।।
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