- एससी वर्ग के साथ ही अन्य समाज के वोटों के लिए ब्राह्मण और मुस्लिम चेहरे पर लगाया दांव
1989
और 1991 में जमानत भी नहीं बचा पाए बसपा उम्मीदवार
धीरेंद्र मिश्र
गाजियाबाद। लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटे हापुड़-गाजियाबाद सीट पर बसपा ने खूब जोर आजमाइश की लेकिन दिल्ली को अपना सांसद यहां से नहीं दे पाई। 1989 से 2019 तक हुए आठ चुनावों में दो बार तो प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो चुकी है।
1984 में बहुजन समाजवादी पार्टी का गठन होने के बाद 1989 में हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट से बसपा ने सुलेमान को अपना प्रत्याशी बनाया। इसके पीछे पार्टी के कैडर वोटों के साथ ही मुस्लिम समाज का वोट पाना था। जनता दल और कांग्रेस के दिग्गजों के सामने बसपा की दाल नहीं गली और पांचवें स्थान पर सिमटना पड़ा। 0.8 फीसदी वोट मिले। जमानत तक जब्त हो गई। दो साल बाद ही 1991 में लोकसभा के फिर चुनाव हुए। इस बार राम मंदिर आंदोलन में भाजपा के सामने बड़े-बड़े दिग्गजों के पांव उखड़ गए। बसपा प्रत्याशी की एक बार फिर जमानत जब्त हो गई। इस बार बसपा के मशाहिद अली को 0.1 फीसदी ही वोट मिले। पार्टी 12वें स्थान पर रही।
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खेला ब्राह्मण और मुस्लिम कार्ड, फिर भी नहीं हुआ बेड़ा पार
1989 से 2019 तक दलित समाज में अपनी मजबूत पैठ बनाने वाली बसपा ने पिछले आठ लोकसभा चुनावों में मुस्लिम और ब्राह्मण कार्ड खेला। इसके पीछे रणनीति यही रही कि इस समाज से भी पार्टी को वोट मिलेंगे। हालांकि, पार्टी को इससे भी कोई खास लाभ नहीं हुआ। आठ लोकसभा चुनावों में पांच बार मुस्लिम, दो बार ब्राह्मण और एक बार वैश्य को टिकट दिया।
क्या है इस बार संभावना
बसपा जिलाध्यक्ष दयाराम सेन का कहना है कि बसपा का प्रदर्शन हमेशा बेहतर रहा है। हार जीत तो लगी रहती है। बसपा के वोटर कहीं और नहीं जाते हैं। पार्टी अकेले दम पर चुनाव लड़ती है। इस बार पूरी उम्मीद है हर बार से बेहतर प्रदर्शन होगा और पार्टी की जीत होगी।
गाजियाबाद लोकसभा सीट पर बसपा का प्रदर्शन
हापुड़-गाजियाबाद सीट
चुनाव उम्मीदवार वोट मिले स्थान
1989 सुलेमान 4492 पांचवां
1991 मशाहिद अली 481 बारहवां
1996 अनवर अहमद 126,194 तीसरा
1999 खालिद 1,93,221 तीसरा
2004 कुंअर अयूब अली 1,80,068 तीसरा
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गाजियाबाद लोकसभा सीट बनने के बाद
2009 अमरपाल शर्मा 1,80,285 तीसरा
2014 मुकुल उपाध्याय 1,73,085 तीसरा
2019 सुरेश बंसल (बसपा-सपा गठबंधन) 4,43,003 दूसरा