गाजियाबाद। प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए जैव विविधता का संरक्षण महत्वपूर्ण है। इसलिए जिले के सभी गांवों में जैव विविधता रजिस्टर तैयार कराया जा रहा है। इस योजना में जिले का अटौर प्रदेश का पहला गांव बना है, जिसने जैव विविधता रजिस्टर तैयार कर लिया है। इस रजिस्टर को उत्तर प्रदेश जैव विविधता बोर्ड में भी पंजीकृत कर लिया गया और इसका डेटा ऑनलाइन हो गया है। इसी की तरह जिले के बाकी गांवों में भी रजिस्टर तैयार कराया जा रहा है। सर्वे के दौरान सामने आई कमियों को पूरा करने के लिए गांव में लगे पेड़ों को संरक्षित कर रहे हैं।
अटौर गांव में पंचायती राज विभाग के साथ समन्वय स्थापित करते हुए वन विभाग और कृषि विभाग की टीम ने सर्वे करने के बाद इस जैव विविधता रजिस्टर को तैयार किया था, जिसमें डीएफओ मनीष सिंह, ग्राम प्रधान मुनेश देवी, छात्रा शीतल चौधरी, वन विभाग से रितु सहित कई सदस्य शामिल रहे थे। जिला पंचायती राज अधिकारी प्रदीप द्विवेदी ने बताया कि सर्वे में यह सामने आया था कि पहले जहां आम और अन्य फलदार पेड़ होते थे, वहां सिर्फ एक आम का पेड़ बचा था।
इस रिपोर्ट के बाद यह समझ में आया कि क्या खो रहे हैं क्या संरक्षित करने की जरूरत है। इसके अलावा इससे गांव के कृषि या वन क्षेत्र की खासियत, उसका संरक्षण, मार्गदर्शन देना और तकनीकी सहायता प्रदान करना है इस भी की जानकारी हुई। इसके बाद सभी गांवों के लिए कितने प्रकार के पशु, पक्षी, सब्जियों के प्रकार, औषधीय पौधे, गांव की विशेष पहचान, प्रमुख फसलें,जलीय जीव सहित जनसंख्या, क्षेत्रफल सहित अन्य जानकारी के साथ रजिस्टर तैयार करने को कहा गया।
फलों के अलावा छायादार वृक्ष भी शामिल
गांव के पूर्व प्रधान रणबीर सिंह और उनकी पत्नी और वर्तमान प्रधान मुनेश देवी ने बताया कि इस गांव में चार वर्ष पहले 40 एकड़ जमीन में लगभग 10 हजार से अधिक पौधे लगाए गए थे, जिसको गांव के लोग ही संरक्षित कर रहे हैं। इसमें अधिकतर छायादार पौधे लगे हैं। इसके अलावा बांस, सीसम, कनेर, जंगल जलेबी, खजूर, जामुन, अमरूद, कचनार, पापड़ी, सागौन सहित कई पेड़ लगाए गए हैं लेकिन इनमें भी आम के पेड़ और फलदार पेड़ अभी भी कम ही हैं। इसके अलावा मोर, कोयल, नील गाय, कीट, पतंगे, तितलियां हैं।
वन क्षेत्र की देखभाल लिए पहले जीडीए ने दो माली रखे थे लेकिन अब वह माली नहीं आ रहे हैं। पहले गन्ना इस गांव की प्रमुख फसल हुआ करता था लेकिन उसमें घाटा होने के कारण अधिकतर किसान घरेलू इस्तेमाल के लिए गेंहूं, धान, बाजरा और सब्जियां उगाते हैं। गांव में जगह-जगह प्लाट काटे जा रहे हैं खेती की जमीनें खत्म होती जा रही हैं।
जानकारी है दर्ज
खरपतवार, औषधीय पौधे, चारा के लायक पौधे, फसलों के कीट, छायादार पौधे, शोभादार पौधे, फलदार वृक्ष, लताएं, जलीय जीव, मछली, जानवर, तितली, लकड़ी वाले वृक्ष, पालतू जानवर, जातिगत जनसंख्या सहित हर छोटी-बड़ी जानकारी इस रजिस्टर में है।
142 गांवों में भी तैयार किया जा रहा है रजिस्टर
सीडीओ विक्रमादित्य सिंह मलिक ने बताया कि जिले के सभी 142 गांवों में जैव विविधता रजिस्टर तैयार करने के निर्देश हैं, जिसमें से लगभग 50 फीसदी गांवों में इस ओर कार्य चल रहा है। सभी गांवों में गांवों में जैव विविधता प्रबंधन समिति का गठन किया गया है, जो इस कार्य को कर रही है।