गाजियाबाद के सिहानी गेट थाना इलाके में स्थित सदर तहसील के चेंबर नंबर 95 में घुसकर नकाबपोश हमलावरों ने अधिवक्ता मनोज चौधरी (38) की कनपटी पर गोली मारकर हत्या कर दी। वारदात के समय मनोज अपने साथी मुनेश त्यागी के साथ खाना खा रहे थे।
गाजियाबाद की तहसील सदर में बुधवार दोपहर करीब दो बजे दो नकाबपोश हमलावरों ने चैंबर में घुसकर वकील मनोज चौधरी उर्फ मोनू (38) की गोली मारकर हत्या कर दी। तहसील में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद होने के बावजूद बदमाश बड़े आराम से पैदल ही भाग निकले। इस दौरान वे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गए।
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हत्या के पीछे मोनू का बहनोई एडवोकेट अमित डागर, उसके भाई एडवोकेट नितिन डागर और उसके परिवारीजनों के साथ विवाद सामने आया है। मोनू की पत्नी कविता ने सिहानी गेट थाने में उनके खिलाफ ही नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई है।
दोपहर के दो बजे थे, अधिवक्ता मनोज चौधरी चैंबर में खाना खा रहे थे। चैंबर के मालिक बैनामा लेखक मुनेश त्यागी बराबर में बैठे थे। पास में ही मुंशी जितेंद्र और गौरव थे। तभी दो नकाबपोश बिजली की तेजी से चैंबर में दाखिल हुए। उन्हें आते हुए किसी ने नहीं देखा। नजर ही तब आए, मनोज के बेहद नजदीक पहुंच गए। दोनों दबे पांव आए थे।
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चश्मदीद मुनेश त्यागी का कहना है कि उनके नकाब देखकर कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही एक ने मनोज की कनपटी पर सटाकर गोली मार दी। फायर की आवाज भी बहुत ज्यादा नहीं हुई लेकिन मनोज के सिर से खून का फव्वारा छूट पड़ा। वह मनोज को देख ही रहे थे कि दोनों हमलावर आंखों के सामने से ओझल हो गए।
गोली की आवाज सुनकर आसपास से लोग चैंबर की तरफ दौड़े। तब तक दोनों जा चुके थे। उन्होंने बताया कि मुश्किल से 30 सेकंड लगे होंगे उनके चैंबर में आने और हत्या करके जाने में। बाद में पुलिस ने सीसीटीवी कैमरे देखे तो पता चला कि दोनों अपनी बाइक कुछ दूरी पर खड़ी करके आए थे।
बाइक से ही भाग निकले। उस समय वकील तहसील बार के अध्यक्ष अशोक कुमार वर्मा की अध्यक्षता में बार सभागार में बैठक कर रहे थे। वकील की हत्या का पता चलने पर सभी मौका-ए-वारदात की तरफ दौड़े।
मोबाइल दफ्तर में रखकर आया
मनोज की बड़ी बहन सरिता ने बताया कि उनके पति अमित डागर ने हत्याकांड को सुनियोजित साजिश के तहत अंजाम दिया है। इसी के तहत वह अपना मोबाइल फोन दफ्तर में छोड़कर आया था ताकि पुलिस उसकी लोकेशन चेक करे तो यह तहसील की नहीं आए। इसके पीछे उसका मकसद घटना के वक्त अपनी लोकेशन नोएडा स्थित अपने दफ्तर की साबित करने का है।
उन्हें इसका पता उनके बेटे से लगा। उन्होंने बताया कि जैसे ही भाई की हत्या का पता चला, उनका शक अमित पर ही गया क्योंकि वह धमकी दे चुका था। उन्होंने अपने बेटे को फोन मिलाया। बेटे ने बताया कि पिता सुबह से यहां नहीं है। वह अपना फोन छोड़ गए हैं।
एसीपी नंदग्राम रवि कुमार सिंह ने बताया कि घटना में इस्तेमाल अमित की बाइक उसके चिरंजीव विहार स्थित घर पर ही मिली है। यह कुछ दिन पहले ही खरीदी गई थी। इस पर नंबर भी नहीं है। यह बाइक फुटेज में नजर आ रही है। सरिता का कहना है कि बाइक को घर पर छोड़ना भी उसकी चाल है। वह साबित करना चाहता है कि उसने हत्या नहीं की लेकिन फुटेज को कैसे नकारा जा सकता है।
भाई की पिस्टल से ली जीजा की जान
सरिता ने बताया कि बेटे के बाद उन्होंने अपनी देवरानी को फोन किया। उससे पूछा कि इन दोनों (अमित और नितिन) ने यह सब क्या कर दिया। देवरानी घबराई हुई थी। उसने बताया कि अमित ने नितिन से कहा था कि उसे पिस्टल दे दे। इस पर नितिन ने घर से अपनी लाइसेंसी पिस्टल निकालकर उसे दी थी।
सरिता का कहना है कि देवरानी की बातों से पता चल गया कि वारदात में पति और देवर शामिल हैं। निश्चित रूप से गोली अमित ने ही चलाई होगी क्योंकि नितिन की पिस्टल उसके ही पास थी। वह कई दिनों से धमकी दे रहा था। पुलिस ने उन्हें हमलावरों के सीसीटीवी फुटेज दिखाए। वह पहचान गईं कि हमलावर कोई और नहीं, उनके पति और देवर ही हैं।
पुलिस तैनात थी फिर भी हो गई हत्या
मंगलवार को हापुड़ में वकीलों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में गाजियाबाद के वकील बुधवार को हड़ताल पर थे। तहसील परिसर में भी अधिवक्ताओं ने काम नहीं किया। आशंका थी कि वे विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। इसे देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
सवाल यह उठ रहा है कि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के मौजूद होने के बावजूद वकील की हत्या कैसे हो गई। वकीलों ने बताया कि जब दोपहर तक कोई हंगामा प्रदर्शन नहीं हुआ तो पुलिसवाले आराम फरमाने लगे। यही वजह रही न तो नकाबपोश हमलावर हत्या करते जाते समय पुलिस की नजर में आए और न ही हत्या करने के बाद भागते हुए।
18 अगस्त को मनाया था बेटे का जन्मदिन
सरिता ने बताया कि 18 अगस्त को मनोज के 13 वर्षीय बेटे आरव का जन्मदिन था। परिवार ने धूमधाम से उसका जन्मदिन मनाया था। आरव ने मनोज से जन्मदिन पर गिफ्ट में साइकिल मांगी थी। भाई ने साइकिल लाकर दी थी। उसके पति ने बच्चों के सिर से पिता का साया छीन लिया। मनोज 2008 से वकालत कर रहे थे। उनके पिता रंजीत सिंह दरोगा थे। उनका निधन हो चुका है।