धीरेंद्र मिश्र
गाजियाबाद। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगने के बाद पूरे देश में इंदिरा विरोधी लहर फैल गई। कांग्रेस कई धड़ों में बंट गई। पुराने कांग्रेसी पार्टी छोड़कर जाने लगे। गैर कांग्रेसी दल एक हो गए। इसी दौरान लंबे से समय से कांग्रेस में सक्रिय रहे मेरठ के जोगीपुरा निवासी कुुंवर महमूद अली खान ने पार्टी छोड़ दी और भारतीय लोकदल में शामिल हो गए। 1977 में मध्यावधि चुनाव में वह हापुड़-गाजियाबाद सीट से प्रत्याशी बनाए गए। उन्होंने कांग्रेस से दो बार सांसद रहे बीपी मौर्य को करीब एक लाख 35 हजार वोटों से हरा दिया। स्वतंत्रता सेनानी लोकनायक जय प्रकाश नारायण के विचारों से प्रभावित होकर वह जनता पार्टी में शामिल हो गए और 1980 में हापुड़-गाजियाबाद सीट से चुनाव लड़े और हार गए।
विश्व हिंदू परिषद के प्रांत सह कोषाध्यक्ष उपेंद्र गोयल बताते हैं कि इमरजेंसी के दौरान पूरे देश में लोगों में गुस्सा था। इस दौरान गाजियाबाद से हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया था। संघ सेवकों को ढूंढ- ढूंढ़कर जेल भेजा जा रहा था। कांग्रेस में दो फाड़ हो गई थी। कांग्रेस ओल्ड, जनसंघ, बीकेडी, सीएफडी, सोशलिस्ट पार्टी एक हो गई थीं। हलधर चुनाव चिन्ह वाली जनता पार्टी मुखर हो चुकी थी। लोकनायक जय प्रकाश नारायण का नारा गलियों में दोहराया जा रहा था। सिंहासन खाली करो जनता आती है, काफी प्रचलित था।
राजनीतिक सफर
मेरठ जिले के जोगीपुरा में 16 जून 1920 को जन्मे कुंवर महमूद अली खान ने 1938 में कांग्रेस पार्टी से राजनीति की शुरुआत की। राजनीति करने के साथ ही उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की और 1950 में वकालत शुरू कर दी। 1957 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर मेरठ के दासना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी से राजनीति की। 1974 में कांग्रेस विरोधी लहर शुरू हुई तो उन्होंने चौधरी चरण सिंह से प्रभावित होकर बीएलडी ज्वाइन कर ली। 1977 में हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट से गैर कांग्रेसी दलों के समर्थन से चुनाव लड़े और कांग्रेस दो बार सांसद रहे बीपी मौर्य को चुनाव हरा दिया। इसके बाद वह जनता पार्टी में चले गए और 1980 में हुए चुनाव में जनता पार्टी एस के प्रत्याशी अनवर अली से हार गए। इसके बाद 1990 से 1993 तक मध्यप्रदेश के गवर्नर भी रहे।
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नतीजा
कुंवर महमूद अली खान (बीएलडी)
2,68,074
बीपी मौर्य (कांग्रेस)
1,32,677