वसुंधरा। सेक्टर-9 के जनसत्ता अपार्टमेंट में एक साल से घरेलू सहायिका को बंधक बनाकर पीटने व प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। दिल्ली की बचपन बचाओ आंदोलन और मेरा रंग संस्था ने नाबालिग को मुक्त कराकर फ्लैट मालकिन रीना शर्मा पर मुकदमा दर्ज कराया है। इंदिरापुरम पुलिस ने नाबालिग को मेडिकल के लिए भेजकर मामले की जांच शुरू कर दी है।
संस्था के प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर अरशद मेहंदी ने इंदिरापुरम कोतवाली में शिकायत दी कि सोमवार को बी-ब्लॉक अपार्टमेंट के फ्लैट संख्या-101 में 17 साल की घरेलू सहायिका को एक साल से बंधक बनाने की सूचना मिली थी। टीम मौके पर पहुंची तो वहां पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी की 17 साल की किशोरी मिली। संस्था निदेशक जितेंद्र परमार ने बताया कि उनकी टीम सोमवार सुबह करीब 11 बजे सोसायटी में पहुंची। उन लोगों ने पाया कि बच्ची के दोनों हाथ सूझे हुए थे और उसके कान एवं चेहरे सहित जिस्म का हर हिस्सा जख्मी था। उसकी पीठ पर बेलन से मारा गया था जिसकी वजह से वो बोल नहीं पा रही थी। गर्दन पर जले एवं कटे के निशान भी थे। दाएं पैर पर खौलता हुआ पानी डाला गया था, जिसकी वजह से बच्ची के पैर जल गए थे। बाएं पैर में जख्म था, जो पिटाई की वजह से फट गया था और एक जगह टांग में हड्डियों से खून रिस रहा था।
एनजीओ की टीम को घरेलू सहायिका रूपा ने बताया कि मालकिन उससे सुबह 6 बजे से रात 2 बजे तक काम कराती थी। बच्ची ने बताया कि होली की रात रीना शर्मा ने उसे बेरहमी से पीटा और मदद के लिए पुकार लगाने पर वह उसके सीने पर बैठ गई। देर रात बच्ची ने दरवाजा थोड़ा सा खुला देखा तो वहां से भाग निकली और रात भर सीढ़ियों के नीचे छिपी रही। सुबह करीब दस बजे सोसायटी के गार्ड ने उसे वहां देखा तो आरडब्ल्यूए पदाधिकारी को इसकी सूचना दी। आरडब्ल्यूए और स्थानीय लोगों ने बचपन बचाओ एनजीओ से संपर्क कर उन्हें सोसायटी में बुलाया।
एजेंट के माध्यम से आई थी काम करने
मेरा रंग संस्था की संस्थापिका और सोसायटी निवासी शालिनी ने बताया कि अपनी ममेरी बहन विद्या के साथ नोएडा आई थी। उसी के साथ रहकर काम की तलाश कर रही थी। वहीं, एक एजेंट के माध्यम से एक साल पहले जनसत्ता अपार्टमेंट में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने आई थी। उन्होंने बताया कि वह रीना शर्मा के यहां फुल टाइम काम कर रही थी। उन्होंने बताया कि मालिक माता-पिता को 4-5 हजार रुपये भेज दिया करती थी।
इनसेट
चाय के बगान में काम करती है मां
किशोरी की मां सिलीगुड़ी के एक चाय बागान में काम करती है जबकि पांव की चोट के कारण पिता घर पर ही रहते हैं। बच्ची ने बताया कि उसे पखवाड़े में एक बार अपने घर फोन करने की इजाजत दी जाती थी और इस बीच अगर उसने इशारों में भी यहां के बदतर हालात के बारे में कुछ बताने की कोशिश की तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। बच्ची ने बताया कि तनख्वाह के नाम पर उसके हाथ में कभी एक पैसा भी नहीं मिला और उससे कहा जाता था कि हर महीने 4,000 रुपये उसके घर वालों को भेजे जाते हैं। बच्ची को एक प्लेसमेंट एजेंसी के जरिये यहां भेजा गया था।
बचपन बचाओ आंदोलन संस्था के कोऑर्डिनेटर की लिखित शिकायत पर मुकदमा दर्ज कर लिया है। मामले की जांच कर अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।
- स्वतंत्र कुमार सिंह, एसीपी, इंदिरापुरम
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