साइबर अपराधियों ने वसुंधरा की ऑलिव काउंटी सोसायटी के निवासी सिविल इंजीनियर शशांक शेखर को चार दिन खौफ में रखकर उनसे 40 लाख रुपये अपने खातों में जमा करा लिए। शातिरों के गिरोह में से किसी ने खुद को बैंक कर्मचारी बताया तो किसी ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का अधिकारी।
शशांक के खाते का इस्तेमाल धन शोधन में होने का डर दिखाकर जेल जाने से बचाने के बदले 27 लाख रुपये शातिरों ने अपने खाते में जमा करा लिए। चार दिन डिजिटल अरेस्ट रहने से शशांक इस कदर खौफजदा हो गए कि ठगी का शिकार होने के 13 दिन बाद पुलिस के पास जाने की हिम्मत जुटा पाए।
साइबर थाने में दर्ज कराई गई एफआईआर में उन्होंने बताया कि 13 नवंबर को उनके पास अनजान नंबर से काॅल आई। काॅलर ने खुद को स्टेट बैंक आफ इंडिया का कर्मचारी बताते हुए कहा, आपके क्रेडिट कार्ड पर 1.09 लाख रुपये का बिल बकाया है। शशांक का कहना है कि उन्होंने कोई बकाया नहीं होने की बात कही तो काॅलर ने काॅल किसी को ट्रांसफर करते हुए बात करने के लिए कहा।
दूसरे काॅलर ने खुद को दिल्ली पुलिस का दरोगा रवि कुमार बताया। उसने यह कहकर डराया कि मामला बहुत गंभीर है और सीबीआई के पास जा चुका है। इसके बाद उसने काॅल ट्रांसफर कर दी। तीसरे काॅलर ने खुद को सीबीआई का अधिकारी नितिन पंवार बताया। उसने राष्ट्रीय खुफिया केस नाम से एक लिंक भेजा।
इसके बाद खुद को सीबीआई अधिकारी बताने वाले काॅलर ने काॅल करके कहा, जांच में पाया गया कि तुम्हारे खाते से 2.59 करोड़ रुपये के काले धन को सफेद किया गया है। इसका केस दर्ज हो चुका है और गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं। यह कहकर काॅल काट दी।
थोड़ी देर बाद व्हाट्सएप पर एक गिरफ्तारी वारंट आ गया। इसके बाद काॅल करके जेल भेजने का डर दिखाया गया। साथ ही कहा कि जेल जाने से बचना है तो बताए गए खाते में 27 लाख जमा करा दो। इस रकम की जांच होगी। अगर वह निर्दोष साबित हुए तो रकम वापस कर दी जाएगी। शशांक ने बताया कि उन्होंने बताए गए खाते में 27 लाख जमा करा दिए। यह खाता मीओ रेस्टोरेंट प्राइवेट लिमिटेड शाखा बिलासपुर नाम से है।
शातिरों ने सात नंबरों से की बात
शशांक ने बताया कि उनके पास सात अलग अलग मोबाइल नंबर से काॅल आई। हर बार उन्हें डराया गया। अपराधी कहते रहे कि जांच चल रही है, यह गोपनीय है, किसी को कुछ न बताएं। वह डरे हुए थे, इसलिए किसी से इस बारे में बात नहीं की। बाद में अहसास हुआ कि अगर एक बार पुलिस को काॅल कर देते तो ठगी का शिकार नहीं होते और न ही इतने लंबे समय तक दहशत में रहना पड़ता है।
शिकायत करने में देरी, फ्रीज नहीं हो सकी रकम
एडीसीपी अपराध सच्चिदानंद से बताया कि इस मामले में शिकायत देरी से मिली। इस वजह से ठगी गई रकम को फ्रीज नहीं कराया जा सका। अगर शिकायत घटना के तुरंत बाद मिल जाती तो रकम फ्रीज कराई जा सकती थी। जिन सात नंबरों का इस्तेमाल ठगी में किया गया, उनकी डिटेल निकलवाई जा रही है। जागरूक रहकर ही ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है।
डिजिटल अरेस्ट के हथकंडे
विदेश से आपका कुरियर आया है, इसमें संदिग्ध सामान है। कई केस में ड्रग्स बताई गई।
आपका बेटा दुष्कर्म के मामले में फंस गया है। उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा जाएगा।
आपके खाते से संदिग्ध लेनदेन हुआ है। इसकी जांच की जा रही है। मामला सीबीआई में है।
आपके खिलाफ धन शोधन का केस दर्ज हुआ है। आपकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हो चुका है।
(अब तक आए मामलों के आधार पर)
जान लीजिए.... ऐसे काम नहीं करती पुलिस
एडीसीपी अपराध ने बताया कि किसी भी मामले में पुलिस मोबाइल से काॅल या व्हाट्सएप काॅल करके जांच नहीं करती है।
किसी भी मामले में पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी कोई भी एप डाउनलोड करने के लिए नहीं कहती है।
कोई भी जांच एजेंसी एफआईआर की काॅपी या गिरफ्तारी वारंट आनलाइन या व्हाट्सएप पर साझा नहीं करती।
पुलिस का कोई वर्चुअल थाना नहीं है। कोई भी जांच एजेंसी किसी भी जांच के लिए खाते में रकम जमा नहीं कराती है।