गाजियाबाद। डॉक्टर साहब पौने तीन वर्ष का मेरा बेटा अद्वैत मोबाइल फोन में बिना कार्टून देखे खाना नहीं खाता है। उसके हाथ से मोबाइल लेने पर वह खाना छोड़कर चिल्लाने लगता है। कई बार फर्श पर अपने सिर भी पटकने लगता है। यह परेशानी आदर्श नगर निवासी विंध्यवासिनी पांडेय ने एमएमजी अस्पताल में डॉक्टर से बताई। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विपिन चंद्र उपाध्याय ने बताया कि बच्चे को वर्चुअल ऑटिज्म की परेशानी हो गई है। डॉ. उपाध्याय ने बताया कि रोजाना की ओपीडी में 150 से 170 बच्चे आते हैं, इनमें 130 से 150 बच्चे मोबाइल लत और वर्चुअल ऑटिज्म के होते हैं।
एमएमजी अस्पताल के मनोचिकित्सा प्रकोष्ठ की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. चंदा यादव का कहना है कि कुछ बच्चे ऐसे होते हैं, जिन्हें बचपन से ही फोन की लत लग रही है, इसमें मां-बाप की जिम्मेदारी अधिक होती है। कई बार माता-पिता भी व्यस्त होने के कारण या बच्चे को खाना खिलाने के लिए मोबाइल का लालच देते हैं। यही लालच देखते ही देखते उनमें लत बन जाता है। इससे बच्चे के विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है और बच्चा जिद्दी हो जाता है। जो बच्चे कम उम्र में स्क्रीन के संपर्क में आ रहे हैं। मोबाइल उपकरणों पर ज्यादा समय बिताते हैं, उनमें तनाव और एंग्जाइटी जैसे व्यवहार संबंधी समस्याएं विकसित होने का खतरा अधिक होता है, जो काफी चिंताजनक है।
बाल रोग विशेषज्ञ एवं प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ. नीरज अग्रवाल ने बताया कि स्मार्टफोन का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग, लैपटॉप और टीवी पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों को बोलने में दिक्कत और समाज में दूसरे लोगों के साथ बातचीत करने में परेशानी महसूस होने लगी है। इस स्थिति को वर्चुअल ऑटिज्म कहा जाता है, इसका मतलब है कि उन बच्चों को ऑटिज्म होता नहीं है लेकिन उनमें उसके लक्षण आ जाते हैं। एक से तीन साल के बच्चों को इसका ज्यादा खतरा होता है। बच्चे जैसे ही बैठना और चलना शुरू करते हैं, फोन के संपर्क में आ जाते हैं। सवा साल से लेकर तीन साल की उम्र तक के बच्चों में ऐसा बहुत ज्यादा देखने को मिल रहा है।
संयुक्त अस्पताल में संचालित साथिया केंद्र के संचालक व काउंसलर मुकेश यादव ने बताया कि एक नवंबर से 31 जनवरी तक 10 से 19 वर्ष के 665 बच्चों का पंजीकरण किया गया। यह सभी मोबाइल लत से परेशान थे। इनमें से 515 बच्चों और युवाओं ने काउंसिलिंग कराई। ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है जबकि सहनशीलता कम हो रही है। मुकेश ने बताया कि यह परेशानी सर्दी में अधिक बढ़ती है। रजाई या कंबल के अंदर बच्चे मोबाइल लेकर पूरी रात रील्स या वीडियो देखते रहते हैं, जबकि मां-बाप को लगता है उनका बच्चा सो रहा है। यह परेशानी निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में अधिक है।
इस तरह से छुड़ाएं लत
खाना खाते समय घर के सभी सदस्य एक साथ खाना खाएं
घर में भी बच्चों के साथ खेलने के साथ ही उन्हें कहानियां सुनाएं
सोने वाले कमरे में मोबाइल और टीबी दूर रखें
मां-बाप की निगरानी में फोन या लैपटाॅप पर पढ़ाई करें
रात के समय बच्चों को मोबाइल फोन का प्रयोग नहीं करने दें
अलग-अलग गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें