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गाजियाबाद में लगातार घट रहा है कांग्रेस का जनाधार

गाजियाबाद ब्यूरो Updated Sat, 25 May 2019 01:20 AM IST
गाजियाबाद में लगातार घट रहा है कांग्रेस का जनाधार
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गाजियाबाद। सबसे लंबे समय तक देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस का जनाधार गाजियाबाद में भी तेजी से घट रहा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में 2.35 लाख वोट पाकर संसदीय सीट पर काबिज हुई कांग्रेस इसके बाद गाजियाबाद में दोबारा सांसद नहीं बना पाई। 2009 में कांग्रेस का वोट प्रतिशत सबसे ज्यादा 32.41 रहा। इसके बाद से लेकर 2019 तक के एक दशक में वोट और जनाधार घटने का सिलसिला लगातार जारी है। इस लोकसभा चुनाव में पार्टी 1.11 लाख वोट तक सिमट गई है।
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सिटिंग सांसद सुरेंद्र प्रकाश गोयल दोबारा चुनाव मैदान में उतरे तो उन्हें 2.69 लाख वोट मिले थे। उनके सामने भाजपा से राजनाथ सिंह ने 3.59 लाख वोट पाकर जीत दर्ज कराई थी। 2004 की अपेक्षा तीन प्रतिशत वोट शेयर बढ़ने के बावजूद यह सीट कांग्रेस के हाथ से चली गई थी। इसके बाद से न तो कांग्रेस इस सीट पर दोबारा काबिज हो पाई और न ही वोट शेयर को संभाल पाई। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सिने अभिनेता रह चुके राजबब्बर को चुनाव मैदान में उतारा तो स्थानीय नेताओं ने बगावती तेवर अपनाए और राजबब्बर को महज 1.91 लाख वोट मिले थे। वह दूसरे नंबर पर रहे थे। अब 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने युवा महिला नेता डॉली शर्मा को प्रत्याशी बनाया तो वोट प्रतिशत और घट गया। इस बार कांग्रेस को महज 1.11 लाख वोट पाकर ही संतोष करना पड़ा। कांग्रेस का जनाधार गाजियाबाद में लगातार गिर रहा है।
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‘विभीषणों’ की वजह से हुई कांग्रेस की दुर्गति
कांग्रेस की इस स्थिति की जिम्मेदार सिर्फ दूसरी पार्टी ही नहीं हैं, खुद कांग्रेस के ‘विभीषण’ भी हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने प्रत्याशी के खिलाफ खुलकर लॉबिंग की। इस बार तो पार्टी के नेताओं की एक बड़ी टीम प्रचार से बाहर रही। पार्टी सूत्रों की मानें तो कुछ नेताओं ने प्रत्याशी के खिलाफ काम किया। इसकी वजह से भी पार्टी की चुनाव में दुर्गति हुई है।
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कांग्रेस संगठन में अब जल्द हो सकता है बदलाव
कांग्रेस के बेहद निराशाजनक रहे चुनाव नतीजों के बाद अब गाजियाबाद जिले में भी पार्टी के संगठन में बदलाव हो सकता है। हालांकि इस बदलाव की चर्चा चुनाव से पूर्व ही शुरू हो गई थी, लेकिन चुनाव का बिगुल बज जाने से इस पर विराम लग गया था। चर्चा है कि नतीजे अगर पार्टी के पक्ष में होते तो संगठन स्तर पर यह बदलाव न होता, लेकिन अब यह परिवर्तन तय माना जा रहा है।
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