जाफराबाद में बीच सड़क 15 साल के नाबालिग की चाकू से गोदकर हत्या करने का मामला हो या जीटीबी अस्पताल में घुसकर मरीज को गोलियों से भूनकर हत्या की बात हो। ऐसी न जाने कितनी ही हत्याओं की वारदातों में नाबालिग लड़कों के गिरोह के नाम सामने आ रहे हैं।
अकेले उत्तर-पूर्वी दिल्ली की बात करें तो वर्ष 2024 के शुरुआती आठ माह में करीब 40 हत्याएं हो चुकी हैं। ज्यादातर हत्या की वारदातों में नाबालिग लड़कों के नाम सामने आए। जिस उम्र में नाबालिगों के कंधे पर बस्ता और हाथों में कलम होना चाहिए थी, उसी उम्र में यह अपराध की दुनिया की ओर रुख कर रहे हैं।
मस्तान, चौधरी, माया, मकोका, अल्लू, शूटर्स, बदनाम गैंग, संजू, 78 गैंग के अलावा और न जाने कितने गैंग राजधानी में उभरकर सामने आ रहे हैं। टशन, नशा, मौज-मस्ती और सोशल मीडिया पर छा जाने की ललक इन नाबालिगों को अपराध के दलदल में घसीट रही है। यह नाबालिग गैंग न सिर्फ समाज, बल्कि पुलिस के लिए भी सिरदर्द बने हुए हैं।
त्या, झपटमारी, लूटपाट, वाहन चोरी, घरों में चोरी, ठक-ठक गिरोह, ठगी की वारदातें, यहां तक दुष्कर्म के मामलों समेत बड़े जघन्य अपराधों में इन नाबालिगों की मौजूदगी बढ़ रही है। हाल में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हत्याओं के मामलों की जांच करते हुए सामने आया है कि जेल में बंद बड़े गैंगस्टरों या उनके गुर्गों ने इन उभरते हुए लड़कों को टूल का तरह इस्तेमाल कर वारदातों को अंजाम दिलवाया।
दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एक औसत के मुताबिक हर साल 70 नए नाबालिग लड़के राजधानी में अपराध की दुनिया में कदम रखते हैं। चूंकि कानून में दी गई नरमी इसकी बढ़ी वजह है, इसलिए लड़के बेखौफ होकर इस दलदल में चले जाते हैं। दिल्ली पुलिस इनको सही रास्ते पर लाने के पूरे प्रयास करती है। अक्सर देखा गया है कि अपनी जरूरतें और नशे की लत को पूरा करने के लिए नाबालिग इस ओर आकर्षित हो जाते हैं।
वहीं, उत्तर-पूर्वी जिला पुलिस उपायुक्त डॉ. जॉय टिर्की ने बताया कि अपराध से जुड़े नाबालिगों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए जिले के चार थानों (न्यू उस्मानपुर, वेलकम दयालपुर और नंद नगरी ) में बॉयज क्लब बनाए गए हैं। अपराधों में शामिल 52 नाबालिग लड़के क्लब से जुड़े हैंं। हर सप्ताह कोई न कोई कार्यक्रम कर इन लड़कों को मुख्य धारा से जोड़ने का काम किया जा रहा है।
मामूली सजा की बात कहकर करा रहे संगीन अपराध
नाबालिगों से कहा जाता है कि पकड़े जाने पर सजा कम होगी, कोई मारेगा-पीटेगा भी नहीं, काम के बदले पैसा भी मिलेगा। ऐसे में नाबालिग बेफिक्र होकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। कानून से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि नाबालिगों के सुधार के लिए किशोर न्यास संरक्षण अधिनियम बना हुआ है। नाबालिगों के लिए बनाए गए नियम और कानूनों में कई खामियां हैंं। इसका फायदा नाबालिग उठाते हैं। वारदात के बाद पुलिस इनको पकड़कर बाल सुधार गृह भेज देती है। कुछ सप्ताह या माह बाद इनको छोड़ दिया जाता है। सुधार गृह से बाहर आकर यह फिर से वारदात करने लगते हैं।
नाबालिगों पर बालिग की तरह केस चलाने की सिफारिश
उत्तर पूर्वी जिला में इस साल हत्या के चार मामलों में शामिल नौ बालिगों पर पुलिस ने बालिग का तरह केस चलाने की सिफारिश की है। इन लड़कों की उम्र 16 से 17 वर्ष के बीच है। जिला पुलिस ने किशोर न्याय बोर्ड में नौ नाबालिगों के खिलाफ पत्र लिखकर मांग है कि उनके खिलाफ बालिगों की तरह केस चलाने की अनुमति दी जाए। हालांकि अभी बोर्ड ने किसी केस में अनुमति नहीं दी है।
सोशल मीडिया पर छा जाने का जुनून
इन नाबालिग लड़कों को सोशल मीडिया पर छा जाने का इतना जनून है कि ज्यादातर लड़कों ने फेसबुक, यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया पर अपने अकाउंट बनाकर वहां हथियारों के साथ अपने वीडियो और गाने तक डाले हुए हैं। माया नामक बदमाश के तो इंस्टाग्राम पर दो हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं।
- हत्या के चश्मदीद गवाह को उतार दिया था मौत के घाट : 4 मई को चौहान बांगर में 4 नाबालिगों ने चाकू से 50 से अधिक वार करके नाजिर नाम के युवक की हत्या की थी। नाजिर अपने भाई आमिर की हत्या का गवाह था। जेल में बंद अलमास उर्फ अल्लू पर हत्या का आरोप लगा था। आमिर के परिवार ने आरोप लगाया था कि अलमास ने नाजिर को कई बार गवाही देने से मना किया था।
7 साल से अधिक सजा के मामले में भेजा जाता है बाल सुधार गृह
पुलिस अधिकारी ने बताया कि सात साल से अधिक सजा वाले मामलों में ही पकड़े जाने पर नाबालिग को बाल सुधार गृह भेजा जाता है। ऐसे मामलों में हत्या, हत्या का प्रयास, लूटपाट और दुष्कर्म के मामले शामिल हैं। जबकि छोटे मामले जिसकी सजा सात साल या उससे कम होती है, ऐसे मामलों में नाबालिग को उसके परिजनों को सुपुर्द किया जाता है।
नाबालिग में नहीं होती निर्णय लेने की क्षमता
नाबालिगों में निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। वह नाम बनाने के लिए कुछ भी कर देते हैं। इनके मूड में तेजी से बदलाव होता है। धैर्य और सहनशीलता कम होती है। भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं। ऐसे में बड़ी आसानी से अपराधों की ओर बढ़ जाते हैं। ऑन लाइन गेमिंग और हिंसात्मक फिल्में भी इनको अपराध की ओर ले जाती हैं। समय पर आदतों की पहचान कर इनको सही रास्ते पर लाया जा सकता है।
-डॉ. लोकेश शेखावत, प्रोफेसर, मनोरोग विभाग, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल
नाबालिगों को अपराध से दूर रखने के पुलिस के इंतजाम
- दिल्ली के कई थानों में पुलिस ने अपनी लाइब्रेरी खोली है
- बाहरी जिला पुलिस उपायुक्त कार्यालय ने बुक बैंक शुरू किया
- निजी कंपनियों की मदद से रोजगार मेलों का आयोजन कराना
- स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास
- अपराधियों को मुख्य धारा में लाने को स्किल ट्रेनिंग कार्यक्रम