ट्रायल कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया था
संवाद न्यूज एजेंसी
बल्लभगढ़। दिल्ली के निर्भया कांड जैसे ही एक मामले में 29 अगस्त को अतिरिक्त सेशन जज पुरुषोत्तम कुमार की कोर्ट ने दोषी को धारा 376 और 302 के तहत फांसी की सजा सुनाई थी। इस मामले में याचिका कर्ता की ओर से उच्च न्यायालय में अपील की गई। शुक्रवार को उच्च न्यायालय ने फांसी की सजा काे निलंबित कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया था।
वर्ष 2022 नवंबर में सेक्टर-7ए स्थित गुरुद्वारे के पीछे बंद गली के साथ बने पार्क में एक महिला का शव पड़ा मिला था। पुलिस जांच में सामने आया कि महिला के दाहिने हाथ पर आरएम स्टार व दोनों कलाइयों पर ओम गुदा हुआ था। सूत्रों के अनुसार, प्राथमिक जांच में सामने आया था कि महिला के साथ पहले दुष्कर्म किया गया और उसके बाद हत्या की गई। शव अर्धनग्न अवस्था में था। गर्दन भी पूरी तरह से टूटी हुई थी। महिला मानसिक रूप से परेशान थी। महिला की पति से अनबन चल रही थी। आरोपी मनोज नेपाली से महिला की मुलाकात एसआरएस मॉल के पास हुई थी। मूल रूप से नेपाल का रहने वाला मनोज नशा करने का आदी था। मनोज महिला का दुष्कर्म करने के इरादे से सेक्टर 7 में बने गुरुद्वारे के पीछे बने पार्क में ले गया। जहां न सिर्फ महिला से दुष्कर्म किया, बल्कि उसके निजी अंगों में रॉड डालकर चुन्नी से गला घोंट दिया।
पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर मुजरिम तक पहुंची। सबूतों के आधार पर न्यायाधीश ने 29 अगस्त को फांसी की सजा सुनाई । फांसी की सजा के फैसले को लेकर आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की। आरोपी के वकील एडवोकेट मनीष कुमार गुप्ता और एडवोकेट अभिमन्यु जांगड़ा ने उच्च न्यायालय में 15 अक्तूबर को दलील दी कि मौजूदा मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था। जांच बंद करने की जल्दबाजी में पुलिस ने नेपाल के एक बेकसूर दिहाड़ी मजदूर को आरोपी बनाकर फंसा दिया। ट्रायल कोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया था, हालांकि, वर्तमान मामले में दो डीएनए रिपोर्ट एक-दूसरे की विरोधाभासी थीं। इसी दलील के आधार पर हाई कोर्ट ने आरोपी की फांसी की सजा को निलंबित कर दिया है।