दिल्ली दंगे के दौरान नाले से मिली अज्ञात शव से शुरू हुई तफ्तीश का फैसला कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपने 39 पन्नों के फैसले में कर दिया। शाम चार बजकर नौ मिनट पर न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने अपना फैसला पढ़ना शुरू किया और मात्र नौ मिनट में चार बजकर 18 मिनट पर सभी दोषियों को ताउम्र जेल में रहने का आदेश सुनाया।
ताहिर हुसैन ने सार्वजनिक विश्वास का दुरुपयोग किया
अभियोजन ने ताहिर हुसैन की भूमिका को विशेष रूप से गंभीर बताया। कहा गया कि वे निर्वाचित नगर पार्षद थे और उन्होंने सार्वजनिक विश्वास तथा अपनी स्थिति का दुरुपयोग किया। शांति बनाए रखने के बजाय उन्होंने गैरकानूनी जमाव को बढ़ावा दिया और सहायता पहुंचाई। अभियोजन के अनुसार नाजिम, कासिम, जावेद और अनस ने अंकित शर्मा का अपहरण किया और हत्या में भाग लिया। नाजिम को चाकू के साथ देखा गया था। अभियोजन ने कहा कि दोषियों ने कोई पछतावा नहीं दिखाया और उन्हें धारा 302/149 के तहत मौत की सजा दी जानी चाहिए।
बचाव पक्ष ने कहा- सुधार की संभावना मौजूद
ताहिर हुसैन की ओर से वरिष्ठ वकीलों राजीव मोहन, तारा नरूला और शिवांगी शर्मा ने दलील दी कि ताहिर को धारा 505, 120बी, 109 और 114 आईपीसी के आरोपों से बरी किया गया है। इससे स्पष्ट है कि न तो उन्होंने हिंसा की साजिश रची और न ही प्रत्यक्ष रूप से हत्या के लिए उकसाया। बचाव पक्ष ने कहा कि कोई भी दोषी सीधे हत्या करते हुए नहीं पाया गया, कोई हथियार बरामद नहीं हुआ और कोई विशिष्ट खुला कृत्य साबित नहीं हुआ।
अदालत ने सभी दोषियों की सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट मंगाई
अदालत ने सभी दोषियों की सामाजिक-आर्थिक रिपोर्ट मंगाई। अनस 31 वर्ष के, अविवाहित और निरक्षर है। वह फल बेचने या रिक्शा चलाने का काम करता था। कासिम और नाजिम भी निरक्षर हैं और मजदूरी या मांस की छोटी दुकान चलाते थे। जावेद फल विक्रेता है। ताहिर हुसैन 12वीं तक शिक्षित है। ताहिर फर्नीचर का व्यवसाय करता था और 2017 में पार्षद चुना गया था। उसकी संपत्तियों से परिवार को लगभग 1.95 लाख रुपये मासिक किराया मिलता है। जेल रिपोर्ट में ताहिर और नाजिम का आचरण संतोषजनक बताया गया, जबकि कासिम के खिलाफ तीन छोटे अनुशासनात्मक उल्लंघन दर्ज हुए।
सजा के दौरान हर परिस्थिति को तौलना जरूरी
अदालत ने कहा कि सजा तय करते समय गंभीर और कम करने वाली दोनों परिस्थितियों का संतुलन आवश्यक है। बचन सिंह, मच्छी सिंह और मनोज जैसे फैसलों में विकसित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि मौत की सजा के लिए “क्राइम टेस्ट” पूरी तरह और “क्रिमिनल टेस्ट” शून्य होना चाहिए, अर्थात अपराध अत्यंत भयावह हो और अपराधी के पक्ष में कोई महत्वपूर्ण कम करने वाली परिस्थिति न हो।
-न्यायालय ने माना कि इस मामले में अपराध की क्रूरता दुर्लभ से दुर्लभतम की ओर झुकती है, लेकिन अपराधियों की परिस्थितियां और सुधार की संभावना संतुलन को बदल देती हैं।
सिर्फ धर्म के आधार पर भीड़ ने निर्दयता से की हत्या: अदालत
फैसले में अदालत ने कहा कि पीड़ित को केवल धर्म के आधार पर निशाना बनाया गया। भीड़ ने उन्हें घेरा, हमला किया, शव को जानवर की तरह बांधकर घसीटा और नाले में फेंक दिया। यह अत्यंत गंभीर परिस्थिति है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि राज्य यह साबित नहीं कर सका कि दोषी सुधार से परे हैं या भविष्य में समाज के लिए स्थायी खतरा बनेंगे।
दोषी का जेल में अस्तित्व समाज के लिए खतरा नहीं: अदालत
अदालत ने कहा कि दंगों के दौरान गलत सूचना और धार्मिक उन्माद फैलाया गया था और निरक्षर लोग ऐसे प्रचार के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। न्यायालय ने पाया कि जावेद और अनस जमानत पर रिहा होने के बाद किसी अन्य अपराध में शामिल नहीं हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि उनमें सामान्यतः हिंसक प्रवृत्ति नहीं है। अदालत ने कहा कि हत्या में किसी भी दोषी के खिलाफ विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य साबित नहीं हुआ और सभी को धारा 149 के आधार पर दोषी ठहराया गया है।
एसीपी अमलेश्वर राय की वैज्ञानिक विवेचना बनी दोषसिद्धि की मजबूत आधारशिला
अदालत ने जांच की वैज्ञानिक पद्धति को दोषसिद्धि की महत्वपूर्ण आधारशिला माना। जांच अधिकारी एसीपी अमलेश्वर राय और उनकी टीम ने छह वर्षों तक सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा, डिजिटल साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शी बयानों को जोड़कर घटनाक्रम की शृंखला तैयार की। इंस्पेक्टर प्रियंका और उनकी टीम ने घटनास्थल से वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य एकत्र किए। अभियोजन ने अदालत में 91 गवाहों के बयान, चिकित्सीय और वैज्ञानिक साक्ष्य तथा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पेश किए, जिन्हें न्यायालय ने विश्वसनीय माना।
इन धाराओं में मिली सजाएं
ताहिर हुसैन
नाजिम, कासिम, जावेद और अनस
अदालत ने स्पष्ट किया कि हत्या और अन्य अपराधों की सजाएं साथ-साथ चलेंगी, लेकिन धारा 302/149 के तहत दी गई आजीवन कठोर कारावास की सजा प्रभावी रहेगी। इस फैसले के साथ उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में से एक में ट्रायल कोर्ट स्तर पर न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया।