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Delhi : लावारिस शवों को मोक्ष दिलाने के लिए दूत बन गईं पूजा, भाई की मौत के बाद बदल गई जिंदगी की दिशा

Sun, 25 Aug 2024 05:45 AM IST
दुष्यंत शर्मा शुजात आलम, नई दिल्ली

सार

निडर, जांबाज और बहादुर पूजा ने समाज में बिना पहचान के मरे हुए इन लोगों के अंतिम संस्कार का बीड़ा उठाया हुआ है। जाति और धार्मिक बंदिशों को तोड़कर वह इन लावारिसों का अंतिम संस्कार करा रही हैं।
 
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अलग राह... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधानपूर्वक अंतिम संस्कार के बिना किसी भी मरने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, लेकिन राजधानी दिल्ली की भागती दौड़ती जिंदगी में अनेक मृतकों को उनके परिजनों के हाथों अंतिम संस्कार नसीब नहीं हो पाता है। इनमें हादसों में और अस्पतालों में मरने वाले लावारिस लोग शामिल हैं। जहां समाज भी ऐसे लोगों से किनारा कर लेता है, वहां 28 साल की पूजा शर्मा इन लावारिसों का मां-बाप, भाई-बहन या रिश्तेदार बनकर उनको उनके अंतिम निवास तक पहुंचाती हैं। निडर, जांबाज और बहादुर पूजा ने समाज में बिना पहचान के मरे हुए इन लोगों के अंतिम संस्कार का बीड़ा उठाया हुआ है। जाति और धार्मिक बंदिशों को तोड़कर वह इन लावारिसों का अंतिम संस्कार करा रही हैं।

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करीब ढाई साल पहले पूजा के सामने ही उसके बड़े भाई रामेश्वर शर्मा की दिल्ली के नंद नगरी इलाके में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इकलौते बेटे की मौत से पिता यशपाल शर्मा भी कोमा में चले गए। पूजा ने पिता और भाई बनकर अपने मरे हुए भाई की अर्थी को मुखाग्नि दी। बस यहीं से उनके जीवन में बड़ा बदलाव आ गया। पूजा ने ऐसे बेसहारा और लावारिस लोगों के अंतिम संस्कार की ठानी। शुरुआत में पूजा को पागल-चंडाल और न जाने क्या-क्या कहा गया। यहां तक कहा गया कि उसके साथ आत्माएं चलती हैं, लेकिन पूजा ने कभी इसकी परवाह नहीं की। वह लगातार अपने काम में जुटी रहीं। मार्च 2022 से अब तक वह करीब 5000 से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं।

काउंसर की नौकरी छोड़कर मुहिम में जुटीं...
28 साल की पूजा परिवार के साथ नंद नगरी के बी-ब्लॉक में रहती हैं। इनके परिवार में बुजुर्ग दादी नरेश कांता शर्मा और पिता यशपाल शर्मा हैं। दादा मदन लाल शर्मा भारतीय सेना में थे। कश्मीर में ड्यूटी के दौरान वह शहीद हो गए थे। पांच साल पहले तक परिवार में सब कुछ अच्छे से चल रहा था। अचानक 20 दिसंबर 2019 को पूजा की मां ममता शर्मा की दिमाग की नस फटने से मौत हो गई। परिवार अभी सदमे से उबरा भी नहीं था कि 13 मार्च 2022 को रात को चार बदमाशों ने भाई रामेश्वर शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी। उस समय पूजा जीटीबी अस्पताल में एचआईवी मरीजों की काउंसलिंग करती थी। उसने बीएसडब्ल्यू और एमएसडब्ल्यू करने के बाद नौकरी शुरू की थी। पिता भी दिल्ली मेट्रो में कांट्रेक्ट पर नौकरी करते थे। पिता की नौकरी चली गई। पूजा ने भी नौकरी छोड़ दी।
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शादी या श्मशान, पूजा ने चुना श्मशान...
भाई की मौत से पहले सबकुछ ठीक था। परिवार ने उसका रिश्ता भी पक्का किया हुआ था। भाई की मौत ने एकदम सब बदल दिया। पगड़ी बांधकर पूजा ने भाई के शव का अंतिम संस्कार किया। अगले दिन अस्थियां लेने श्मशान पहुंची तो वह शिवलिंग से लिपटकर बहुत रोई। उसने अस्थियां चुनने के बाद श्मशान की राख को माथे से लगाया। पूजा ने प्रण लिया कि वह लावारिस लाशों की वारिस बनेगी। अगले ही दिन 16 मार्च को वह लावारिस लाशों की जानकारी जुटाने के लिए जीटीबी अस्पताल पहुंच गई। इसके बाद पूजा के सामने विकल्प रखा गया वह शादी को चुनेगी या श्मशान। पूजा ने शादी को त्यागकर श्मशान को चुना और इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

अंतिम संस्कार करने के लिए ज्वेलरी भी बेची...
शादी के लिए पूजा की मां ने ज्वेलरी बनवाई थी। उसने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के लिए उसे बेच दिया। भाई की आखिरी निशानी उसकी स्कूटी भी बेच दी। दादी ने अपना मकान भी गिरवी रख दिया। उसने शवों का अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया। जहां से भी सूचना मिलती पूजा शवों को लाती हैं। उनकी धार्मिक पहचान के प्रयास करने के बाद उसके धर्म के अनुसार शवों को जलाया या दफनाया जाता है। न तो पूजा को श्मशान से डर लगता है और न ही उसे कब्रिस्तान जाने से डर लगता है। अंतिम संस्कार के बाद हर महीने अमावस्या को हरिद्वार स्थित कनखल घाट जाकर वह इनका पिंड दान भी करती हैं।

500 से अधिक बच्चों के लिए करती हैं खाने का इंतजाम
किसी भी शव के अंतिम संस्कार के लिए दो से चार हजार रुपये का खर्च आता था। शुरुआत में पूजा ने किसी तरह रुपयों का इंतजाम कर अपने जनून को पूरा किया। बाद में उसने एक संस्था बनाकर सोशल मीडिया पर लोगों से मदद की अपील की। लोगों ने 10, 20, 50 रुपये देकर मदद करना शुरू कर दिया। पूजा ने लोगों की मदद से शवों का अंतिम संस्कार करने के अलावा गरीब बच्चों को खाने का इंतजाम भी शुरू किया। रोजाना वह करीब 500 बच्चों के लिए भोजन का इंतजाम करती है। पूजा के पिता अब पहले से ठीक हैं, लेकिन उनको दौरे पड़ते हैं। उनका इलाज जारी है।

दूसरे राज्यों से भी आने लगीं कॉल...
लोगों के लिए मिसाल बन चुकी पूजा पूरे जुनून के साथ अपने काम में लगी है। उसे जहां से भी खबर मिलती है, वह वहां पहुंचकर अपने काम को अंजाम देती है। पूजा ने बताया कि अब उसके पास फरीदाबाद, गुरुग्राम, यूपी और नोएडा भी अंतिम संस्कार के लिए कॉल आने लगी हैं। पिछले दिनों नोएडा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उन्हें कॉल कर नोएडा में भी काम शुरू करने के लिए कहा है।

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