दिल्ली के सिविक सेंटर में आज (22 फरवरी) मेयर का चुनाव हो रहा है। दिल्ली नगर निगम चुनाव के लगभग ढाई महीने बाद हो रहे इस चुनाव में जो प्रत्याशी जीतेगा वह सिर्फ 31 मार्च तक के लिए ही महापौर के पद पर रह सकेगा। अगर आप ये सोच रहे हैं कि ऐसा क्यों होगा तो इसके लिए आपको एमसीडी एक्ट के बारे में जानना होगा। दूसरे राज्यों में मेयर पांच साल के लिए चुने जाते हैं लेकिन दिल्ली में पांच साल में पांच बार मेयर क्यों चुना जाता है।
डीएमसी एक्ट में है मेयर चुनाव के प्रावधान
मालूम हो कि निगम चुनाव और मेयर चुनाव के सभी प्रावधान डीएमसी एक्ट में मौजूद हैं। इसी कानून के तहत दिल्ली में हर साल मेयर के चुनाव होते हैं। डीएमसी एक्ट की धारा दो (67) के अनुसार एमसीडी का अप्रैल माह के प्रथम दिन से वर्ष शुरू होता है। इस तरह 31 मार्च को वर्ष समाप्त हो जाता है। लिहाजा दिसंबर माह में चुनाव के बाद चुने जाने वाले मेयर का कार्यकाल करीब तीन माह में ही समाप्त हो जाता। हालांकि अब जब मेयर का चुनाव फरवरी में हो रहा है तो 31 मार्च के बाद उसका कार्यकाल खत्म हो जाएगा। हालांकि मेयर का कार्यकाल एक साल का ही होता है लेकिन वित्तीय वर्ष खत्म होने में एक महीने से थोड़ा ही अधिक समय है तो नया मेयर 31 मार्च तक पद पर रहेगा।
क्या है हर साल मेयर चुनाव कराने की वजह
एमसीडी का कानून बनाते वक्त यह ख्याल रखा गया था कि हर वर्ग को निगम में प्रतिनिधित्व मिले। यही वजह है कि निगम के मेयर चुनाव में पहले वर्ष के लिए महिला मेयर चुनने का प्रावधान है, वहीं तीसरे वर्ष में एससी/एसटी उम्मीदवार ही मेयर का चुनाव लड़ सकता है। इस तरह से समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व निगम में होता है।
पहले वर्ष में चुनी जाती है महिला महापौर
डीएमसी एक्ट के अनुसार पहले साल महिला पार्षद को महापौर चुनने का प्रावधान है। इस तरह महिला पार्षद को महापौर के तौर पर करीब एक माह ही कार्य करने का अवसर मिलेगा और वह पूरा हक मिलने से वंचित हो जाएगी।
1997 में हुआ था ऐसा
वर्ष 1997 में एमसीडी के चुनाव फरवरी माह में कराए गए थे और चुनाव के बाद एमसीडी के सदन के गठन की कवायद आरंभ की गई। उस दौरान डीएमसी एक्ट के जानकारों ने बताया था कि एमसीडी का वर्ष 31 मार्च को खत्म होता है। इस कारण पहले साल महापौर चुने जाने वाली महिला पार्षद का कार्यकाल एक माह बाद ही समाप्त हो जाएगा। यह मामला सामने आने के बाद एमसीडी के सदन का गठन एक माह तक नहीं किया गया था। पार्षदों को अप्रैल माह में शपथ दिलाई गई थी और महापौर का चुनाव भी अप्रैल माह में ही कराया गया था। इस तरह फरवरी माह में चुने गए पार्षद करीब एक माह तक खाली रहे थे।