दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिंग के आधार पर धारणाओं का न्याय प्रणाली में कोई स्थान नहीं है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश की आलोचना करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें कहा गया था कि महिला सदस्य किसी व्यक्ति पर हमला, अपहरण और हत्या के प्रयास के अपराधों में भाग नहीं ले सकती। साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को ट्रायल कोर्ट में वापस भेज दिया।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने स्पष्ट किया कि लिंग के आधार पर धारणाएं सत्य और न्याय की खोज को कमजोर कर देंगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा मामले में ट्रायल कोर्ट ने ऐसा कोई कारण नहीं बताया कि किस वजह से उसे इस स्तर पर विश्वास करना पड़ा कि आरोप लगाए जाने के बावजूद महिला सदस्य अपराध में भाग नहीं ले सकती।
ट्रायल कोर्ट ने मामले में पांच आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। पांच महिला आरोपियों को इस आधार पर बरी कर दिया था कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था कि उन्होंने पुरुष आरोपियों को उकसाया था। सरकार ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।