डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस तकनीक से बीमारी की पहचान लक्षण आने से पहले हो सकेगी। ऐसा होने पर हर साल हजारों मरीजों को बचाया जा सकेगा। इन जांच के बारे में डॉक्टरों का कहना है कि अमेरिका में यह जांच होती है और इसकी मदद से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौत को 20 फीसदी तक कम किया जा सका है।
धूम्रपान करने वाले होंगे अध्ययन में शामिल
एम्स के अध्ययन से जुड़े पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के डॉक्टर आयुष गोयल ने बताया कि इस अध्ययन में 20 साल से प्रतिदिन एक पैकेट सिगरेट पीने वाले 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को शामिल किया जाएगा। यह लोग एम्स के 9821735337 नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। यहां फोन करने पर डॉक्टर मरीज से पूरी जानकारी लेगा। बाद में अध्ययन के लिए मानकों को पूरा करने वाले लोगों को ओपीडी में बुलाकर लो-डोज सीटी स्कैन जांच की जाएगी। इसके बाद यह देखा जाएगा कि इस जांच की मदद से कैंसर की पहचान शुरुआती दौर में कितनी सफल रूप से हो पाती है। उन्होंने कहा कि अभी लक्षण वाले मरीजों की बायोप्सी जांच होती है तो बीमारी काफी फैल चुकी होती है। अध्ययन में उन लोगों को टारगेट किया जा रहा है, जिन्हें शुरुआती स्टेज का ट्यूमर तो होता है लेकिन लक्षण नहीं होता और वे शारीरिक रूप से ठीक दिख रहे होते हैं।
लक्षणों को हल्के में लेते हैं मरीज
एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि अक्सर कैंसर के मरीज लक्षणों को हल्के में लेते हैं। कैंसर विभाग में जांच के लिए आने वाले मरीजों में देखा गया है कि फेफड़ों का कैंसर होने पर खांसी, बलगम, बलगम के साथ खून आने, सांस में परेशानी, सीने में दर्द के शुरुआती लक्षण दिखते हैं। इसके अलावा अन्य बीमारी और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) की समस्या भी आती है, लेकिन मरीज इन्हें नजरअंदाज करते हैं। स्थिति गंभीर होने के बाद जांच का ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता।