फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अध्ययन: धूल कणों से लड़ रहा एनसीएपी, कुल खर्च का 64 फीसदी फंड सड़कों से धूल हटाने पर; बाकी प्रदूषक नजरअंदाज

Sat, 20 Jul 2024 07:34 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत आवंटित फंड का करीब 64 फीसदी सड़कों से उड़ने वाली धूल के निपटान पर जा रहा है। जबकि वाहन और औद्योगिक प्रदूषण पर खर्च सीमित है। इसका खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक रिपोर्ट में हुआ है।
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

केंद्र सरकार बेशक वायु प्रदूषण को कम करने की दिशा में गंभीर है, लेकिन इसका जोर धूल के कणों से लड़ने पर ज्यादा है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत आवंटित फंड का करीब 64 फीसदी सड़कों से उड़ने वाली धूल के निपटान पर जा रहा है। जबकि वाहन और औद्योगिक प्रदूषण पर खर्च सीमित है। इसका खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक रिपोर्ट में हुआ है। 

विज्ञापन


नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम एन एजेंडा फॉर रिफॉर्म नाम की रिपोर्ट शुक्रवार इंडिया हैबीटेट सेंटर में जारी हुई। रिपोर्ट बताती है कि एनसीएपी के तहत आवंटित धन का करीब 0.61 फीसदी औद्योगिक प्रदूषण, 1.65 फीसदी निर्माण व ध्वस्तीकरण मलबा, 12.63 प्रतिशत वाहन प्रदूषण और 14.52 प्रतिशत बायोमास पर खर्च होता है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, धूल के महीन कणों का आकलन भी एनसीएपी के तहत ठीक नहीं है। अभी सरकार का जोर पीएम10 पर है। जबकि स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह ज्यादा पीएम 2.5 है। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि एनसीएपी में पीएम 2.5 के साथ दूसरे प्रदूषकों को सीमित करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना पर काम करना चाहिए।
विज्ञापन


रिपोर्ट के मुताबिक, स्वच्छ ईंधन, सड़क परिवहन क्षेत्रों, पुराने वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाना, वाहनों का विद्युतीकरण, सार्वजनिक परिवहन में सुधार, पार्किंग नीति के बारे में कम जानकारी है। ऐसे में उद्योग, परिवहन, ठोस ईंधन पर ध्यान केंद्रित होना जरूरी है। यही नहीं, गैर-पारदर्शी, अनुपलब्ध डेटा कार्यवाही की रिपोर्ट में पारदर्शित की आवश्यकता है, ताकि लागू हुए समाधानों की समझ को गहरा किया जा सके।

विज्ञापन

एनसीएपी के उद्देश्य और लक्ष्य सराहनीय रहे हैं। इसमें खास बात यह है कि उद्योगों या वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर ध्यान न देकर धूल कण को नियंत्रण करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके प्रभावी परिणाम के लिए धन का संतुलित उपयोग महत्वपूर्ण है। -सुनीता नारायण, महानिदेशक, सीएसई

शहरों का मूल्यांकन विभिन्न मानकों के आधार पर किया जाता है। प्रगति का मापदंड बनाने के लिए इन मानकों के उपयोग के प्रभावों और इनके वास्तविक सुधार पर असर के बारे में गंभीर प्रश्न हैं। -अनुमिता रॉय चौधरी, कार्यकारी निदेशक, सीएसई

एनसीएपी बनाम एसवीएस
रिपोर्ट के मुताबिक, 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर दिल्ली, गाजियाबाद, मेरठ, आगरा व जबलपुर स्वच्छ वायु सर्वेक्षण (एसवीएस) के तहत अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन एनसीएपी के तहत पीएम 10 को कम करने में खराब प्रदर्शन किया है। दिल्ली एसवीएस में नीतिगत उपायों के कार्यान्वयन के लिए 9वें स्थान पर थी, लेकिन एनसीएपी के तहत नीचे थी और शून्य स्कोर प्राप्त किया।

स्वच्छ तकनीक पर हो काम
15वें वित्त आयोग के अनुदान के तहत मौजूदा वित्त पोषण प्रणाली 2025-2026 में समाप्त हो जाएगी। स्वच्छ तकनीकियों, ईंधन, हरित बुनियादी ढांचे और शहरी डिजाइन समाधानों पर क्षेत्रवार कार्रवाई में तेजी लाने के लिए क्षेत्रीय वित्त पोषण रणनीतियों को अधिक कुशलता से लागू करने की आवश्यकता है। सीएसई का कहना है कि कचरे से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहिए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें