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पिता की संपत्ति पाने के लिए किया शर्मनाक काम

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जायदाद की लालच में आकर लोग अपने माता-पिता तक के साथ कैसा सलूक करते हैं यह बात दिल्ली में हुए केस को देखकर साफ समझी जा सकती है।
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बता दें कि दिल्ली के एक दंपति रूपेश और अल्का ने अपने 80 साल के बुजुर्ग पिता रामानंद शर्मा को पैतृक संपति के बंटवारे के लिए इतना परेशान किया कि मजबूरन शर्मा को उनके खिलाफ सीनियर सिटिजेन कोर्ट का रुख करना पड़ा। जहां से इसी साल 2 अप्रैल को कोर्ट ने दंपति को शर्मा की संपत्ति से बेदखल कर दिया।

बेटे को म‌िल जाती प‌िता की संप‌त्त‌ि लेक‌िन...

हालांक‌ि रूपेश यहीं नहीं रुका उसने सीनियर सिटिजेन कोर्ट के आदेश के खिलाफ सिविल कोर्ट में याचिका दायर की। यह याचिका दायर करते हुए रूपेश ने अतिरिक्त जिला जज के सामने 9 मई की तारीख का एक जजमेंट भी पेश किया।

इस जजमेंट में लिखा था कि सीनियर सिटिजेन अदालत के अतिरिक्त जिला जज ने अदालत के पुराने आदेश पर स्टे लगा दिया है। इसका मतलब था कि अदालत ने अपने पुराने आदेश में रूपेश और उसकी पत्नी को जायदाद से बेदखल किया था उस आदेश पर स्टे लग गया है।

इस जजमेंट को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त जिला जज लाल सिंह दंपति के पक्ष में फैसला सुनाने ही वाले थे कि वह शर्मा की संप‌त्ति पर अपना अधिकार जमा सकते हैं।

स्टे ऑर्डर की कॉपी में थी बड़ी गलत‌ियां

लेकिन रूपेश और उसकी पत्नी को यह खुशी मिल नहीं सकी क्योंकि इसी बीच शर्मा के वकील गगनप्रीत सिंह ने स्टे ऑर्डर पर शंका जाहिर कर दी। शर्मा के वकील ने अदालत को बताया कि स्टे ऑर्डर की कॉपी के हेडलाइन में दो बहुत बड़ी स्पेलिंग की गलतियां हैं।

यह गलतियां थीं स्टे की स्पेल‌िंग में अंग्रेजी अक्षर ए की जगह ई (STEY) का होना और अगेंस्ट की स्पेलिंग में अतिरिक्त ई (AGAINEST) का होना। शर्मा के वकील ने कहा कि एक जज जो बहुत पढ़ा लिखा होता है ऐसी बड़ी गलती नहीं कर सकता।

स्टे ऑर्डर पर एडीएम की सील भी हमेशा से कुछ छोटी थी। वकील की इन दलीलों के बाद जज स‌िंह ने स्टे ऑर्डर के जांच के लिए उसे सीनियर सिटिजेन कोर्ट भेजा।

एफआइआर दर्द कराने को लगाने पड़े कई चक्कर

जांच के बाद जज को पता चला क‌ि 9 मई को इस केस की कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। यहां तक कि 9 मई को तो कोर्ट ही नहीं चली थी। इसका साफ मतलब यही निकलता था कि दंपत‌ि ने अदालत का आदेश अपने पक्ष में कराने के ल‌िए फर्जी स्टे ऑर्डर लिया था।

शर्मा के वकील गगनप्रीत का कहना है क‌ि हमने फर्जी दस्तावेजों और जाली अटेस्टमेंट के बारे में तो सुना है लेकिन नकली जजमेंट का यह पहला मामला उनके सामने है।

इस वाकये के बाद बिना कोई समय गंवाए शर्मा ने अपने बेटे बहू के खिलाफ पुलिस में आपर‌ाधिक मामले में केस दर्ज करा दिया। इसके लिए पहले तो शर्मा एसएचओ से लेकर इकोनॉमिक ऑफेंसेस व‌िंग तक के चक्कर लगाए पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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चल रही है जांच

आखिरकार शर्मा ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारका के आगे गुहार लगाई, जिन्होंने पुलिस को शर्मा की एफआइआर आइपीसी की धारा 468 और 471 के अधीन दर्ज कराने का आदेश दिया।

एफआइआर दर्ज होने के बाद पुलिस छानबीन में ये बात सामने आई क‌ि सीनियर सिटिजेन कोर्ट के एडीएम ने शर्मा की संपत्त‌ि से बेटे-बहू को बेदखल करने के आदेश पर कोई स्टे नहीं लगाया है।

साथ ही साथ यह भी पता चला क‌ि स्टे ऑर्डर की कॉपी जाली है और इसे रूपेश व अल्का ने अपने फायदे के ल‌िए बनाया था। ताकि वह सिविल कोर्ट का फैसला अपने पक्ष में करा सकें और शर्मा की संपत्त‌ि में से हिस्सा पा सकें।
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