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लापरवाही से गई थी नवजात की जान, डॉक्टरों ने कहा- बच्चा तो पेट में ही मर गया था..

Thu, 05 Apr 2018 10:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
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एक बार फिर सिविल अस्पताल स्टाफ पर डिलीवरी के दौरान लापरवाही बरतने का आरोप लगा है। बुधवार को डबुआ कॉलोनी निवासी किरण की डिलीवरी हुई तो नवजात बच्चे की मौत हो गई।

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डाक्टरों का कहना है कि बच्चा पेट में ही मर चुका था। उधर, परिजनों ने डॉक्टर और अस्पताल के स्टाफ पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए हंगामा किया।

पीड़ित परिजनों के मुताबिक, अस्पताल में सुबह 9 बजे किरण को डिलीवरी कराने के लिए बीके सिविल अस्पताल लाया गया। किरण की हालत खराब थी।

इसके बावजूद उसे करीब पौने 11 बजे तक कोई डाक्टर या नर्स देखने नहीं पहुंची। बाद में डाक्टर उसे डिलीवरी के लिए ले गए, मगर थोड़ी ही देर बाद बताया कि बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ है।

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मामले में जमकर हंगामा हुआ

डाक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए परिजनों ने हंगामा किया। किरण की बहन दुर्गेश और अन्य परिजनों का आरोप है कि किरण काफी देर तक दर्द से तड़पती रही, इसके बावजूद कोई डाक्टर उसे देखने तक नहीं आया।

किरण की जेठानी सोनी का आरोप है कि डॉक्टर मंजरी ने परिवार से एक कागज पर बच्चे की गर्भ में ही धड़कन बंद होने की बात लिखकर देने को भी कहा था। परिवार ने ऐसा करने से इंकार कर दिया।

हादसे से एक दिन पहले ही किरण की रूटीन जांच में जच्चा-बच्चा दोनों को स्वस्थ बताया गया था। किरण के ससुर का कहना है कि अस्पताल की लापरवाही की शिकायत सीएम विंडो, जिला उपायुक्त, मुख्य चिकित्सा अधिकारी से करेंगे।

उधर, हादसे  के बाद अस्पताल प्रशासन का कहना है कि नवजात किसी हादसे का शिकार नहीं हुआ। परिवार वालों ने गर्भवती को अस्पताल लाने में ही देर कर दी। पीड़िता के तीमारदारों का कहना है कि दो घंटे पहले लाकर भी अगर देर कर दी तो वक्त पर आने वालों का सही समय डाक्टर ही बता दें।

'करीब पौने ग्यारह बजे किरण की डिलीवरी की गई। डिलीवरी न होती या फिर डिलीवरी में किसी तरह की अनदेखी को लापरवाही कहना चाहिए। मैंने गर्भवती के आने और प्रसव पीड़ा के अनुसार वक्त पर डिलीवरी कराई। अस्पताल देर से लाने के कारण नवजात की धड़कन गर्भ में ही बंद हो चुकी थी।' - डा. मंजरी, बीके सिविल अस्पताल 

'मैं और मेरी बहन किरण दोनों नौ महीने की गर्भवती थे। बहने के साथ हुए हादसे के बाद मैं अपने बच्चे की जान के साथ खिलवाड़ नहीं होने दूंगी। चाहे कितना भी पैसा खर्च हो, यह जान की कीमत से ज्यादा नहीं है। प्राइवेट अस्पताल में डिलीवरी करने वाले जान की कीमत समझते हैं।'  -गर्भवती दुर्गेश, पीड़िता किरण की बहन 
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