युवक ने अस्पताल में तोड़ा दम
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इसी के चलते पटेल गार्डन में रहने वाली उनकी बेटी उन्हें अपने साथ अपने घर ले गई। उसके बाद से मनकौर अपनी बेटियों के साथ ही रहने लगी थीं। सालों बीत जाने के बावजूद शमशेर उनकी कोई खैर खबर भी नहीं लेता था।
बेटे और बहू के इस रवैये से मनकौर बहुत परेशान थीं। वह 14 सालों तक अपने बेटे और बहू से मिलने के लिए तड़पती रहीं, लेकिन उनके बेटे और बहू ने उनकी बीमारी की हालत में भी उन्हें पलट कर नहीं देखा।
उनके इस व्यवहार को देखते हुए मनकौर का मन इतना आहत हो गया कि उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में शमशेर को उनके मौत के बाद अर्थी से भी हाथ लगाने से इंकार कर दिया था। मनकौर की मौत के बाद शमशेर अपनी बहन के घर पटेल गार्डन तो पहुंचा, लेकिन घर के बाहर गैरों की तरह बैठा रहा।
चारों बेटियों ने ही अपनी मां की अर्थी को सजाया और कंधे पर रखकर श्मशान तक ले गईं। उसकी बाद बहनों ने मिलकर अपनी मां का अंतिम संस्कार किया। इस घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया और एक ऐसी सीख दी जिससे साफ हो गया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से पीछे नहीं होतीं।