यह न्याय का प्राकृतिक सिद्धांत है कि अगर किसी के खिलाफ शिकायत मिलती है तो उसकी जांच तीसरा पक्ष करेगा। इसी नियम पर पुलिस भी जांच करती है लेकिन जब आरोप पुलिस वालों पर लगता है तो उसकी जांच भी अक्सर वही पुलिस वाले करते हैं जिन के खिलाफ शिकायत या आरोप है।
मतलब, आरोपी पुलिस अधिकारी अपने खिलाफ शिकायत की खुद जांच कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर रहे हैं।
ताजा मामला पूर्वी दिल्ली के मधु विहार थाने का है। याची प्रमोद कुमार पांडेय की ओर से अधिवक्ता विपिन बंसल ने दस जून 2014 को याचिका दायर कर एसएचओ राजकुमार शाह, एसआई अंशुल कुमार, राहुल व हवलदार ऋषिपाल के खिलाफ मारपीट, बंधक बनाने, धमकी देने, रंगदारी व आपराधिक साजिश का आरोप लगाते हुये मुकदमा दर्ज करने की मांग की थी।
याची प्रमोद कुमार पांडेय का आरोप था कि पुलिस ने उसके व उसके दोस्त संजीव के खिलाफ झूठा मुकदमा राहुल की शिकायत पर दर्ज किया। आरोपी पुलिस अधिकारियों ने याची और उसके दोस्त से मारपीट की और मुकदमा नहीं करने के लिए चालीस हजार रुपये लिए।
एसआई अंशुल कुमार ने संजीव के सिर पर पिस्टल रखकर जान से मारने की धमकी दी। राहुल खुद दिल्ली पुलिस में एसआई है और मधु विहार थाना स्थित पुलिस कालोनी में रहता है।
कड़कड़डूमा अदालत के महानगर दंडाधिकारी मुनेश गर्ग ने याचिका पर सुनवाई के बाद 26 जुलाई 2014 को आरोपी पुलिस वालों के खिलाफ दायर शिकायत पर डीसीपी को 29 अगस्त 2014 तक स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था।
अधिवक्ता विपिन बंसल के मुताबिक डीसीपी अजय कुमार ने शिकायत की जांच किसी अन्य अधिकारी के बजाय खुद एसएचओ को करने दी। इतना ही डीसीपी ने एसएचओ राजकुमार शाह को यह रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के लिये लिखित तौर पर अधिकृत भी कर दिया।