एसटीएफ की विंग एसआईटी ने 3726 करोड़ से अधिक का घोटाला करने वाले एबलेज कंपनी के मालिक अनुभव मित्तल समेत छह आरोपियों के खिलाफ सोमवार को 37000 पेज की चार्जशीट अदालत में पेश की।
हालांकि इसमें 550 पेज की केस डायरी भी शामिल है। माना जा रहा है कि यह अब तक सबसे बड़ी चार्जशीट है। कंपनी करीब 40 करोड़ रुपये दूसरी कंपनियों में भेजकर इस्तेमाल कर चुकी थी।
एसपी राजीव नारायण मिश्र ने बताया कि उक्त आरोपियों का लक्ष्य कंपनी को दिवालिया घोषित कराना था। इसके बाद कानूनी तरीके से वह धोखाधड़ी करके आराम से रह सकते थे। कंपनी के मालिक अनुभव मित्तल, पिता सुनील मित्तल, पत्नी आयुषी मित्तल, कंपनी के सीईओ श्रीधर, कंपनी के तकनीकी प्रमुख महेश दयाल और यश बैंक के मैनेजर अतुल मिश्रा के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया है।
एसटीएफ 37000 पेज की चार्जशीट को गत्ते के डिब्बों में भरकर कोर्ट लाई। मगर अदालत ने चार्जशीट को सुरक्षित रखने के लिए एसटीएफ से उन्हें अपने सामने ही बक्सों में बंद कराया।
यह था प्रकरण
एसटीएफ के डीएसपी राजकुमार मिश्रा ने बताया कि फरवरी में एबलेज कंपनी का फर्जीवाड़ा सामने आया था। कंपनी ने साढे़ 6 लाख लोगों को जोड़ा था और इसमें 9 लाख लोगों की आईडी लगाई गई थी। प्रत्येक सदस्य को 57,500 रुपये लेकर उसे जोड़ा जाता था और उसे एक लाइक करने करने पर 5 रुपये मिलते थे। करीब तीन माह में एसटीएफ ने पूरी जांच-पड़ताल की। इस दौरान उसने पाया कि कंपनी मालिक और अफसरों का मुख्य उद्देश्य एबलेज को दिवालिया घोषित कराना था। कंपनी ने इसके लिए भूमिका भी बना ली थी। कंपनी के नाम पर करीब 12 करोड़ रुपये की संपत्ति थी। एबलेज ने इसमें जेपी और ओमेक्स में प्रॉपर्टी खरीदी थी, इसका उल्लेख कंपनी ने अपनी साइट पर भी कर रखा था, ताकि रुपये लगाने से पहले लोगों को विश्वास हो जाए कि उनकी कंपनी की संपत्ति 12 करोड़ है।
भारत का कानून इजाजत नहीं देता ऐसे व्यापार को
एबलेज कंपनी ने जिस तरह से लोगों के रुपये को लगवाय था, उस प्रक्रिया को देश के काननू में मान्यता नहीं दी गई है। हालांकि इसे बिजनेस मॉडल भी कहा गया है और इसमें मनी सर्कुलेशन के माध्यम से लोगों के रुपये को धोखे से लगवाकर उन्हीं तक घुमाया गया था। कंपनी को बिना कोई काम किए लोगों के रुपये उन्हीं को किस्तों में वापस कर विश्वास जीतना था और बाद में अपने खुद को दिवालिया घोषित करना था।
कंपनी पर 1700 करोड़ की देनदारी
एसटीएफ के अफसरों ने बताया कि कंपनी पर 1700 करोड़ रुपये की देनदारी सामने आई है। हालांकि घोटाला 3726 करोड़ से अधिक रुपये का है। अफसरों का मानना है कि जिन रुपयों का गैर कानूनी तरीके से लेन-देन हुआ था वह तो 3726 से अधिक था। मगर 1700 करोड़ रुपये वह रकम है, जो लोगों से ली गई और इसके बदले उन्हें कुछ नहीं दिया।
डूब गई रकम, अब नहीं उम्मीद
ग्रामीण दिलेर सिंह का कहना है कि प्राधिकरण ने उनकी जमीन को अधिग्रहीत किया था और उसके हिस्से में करीब 10 लाख रुपये मुआवजा आया था। उसने अपनी मुआवजे की सारी रकम लाइक के व्यापार में लगा दी थी। करीब एक लाख रुपये उसे वापस भी मिल गए थे, मगर बाकी रकम डूब गई। अब उसके मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं है।
छात्र देवांश का कहना है कि वह अपने दोस्त से कुछ रुपये उधार लेकर सदस्य बना था। इसके बाद उसने अपने परिवार के अन्य सदस्यों को इससे जोड़ा और करीब 10 सदस्य बना लिए। इसमें रुपये नहीं डूबने की गारंटी उसी ने ली थी। शुरू में 10-15 हजार रुपये सभी को मिल गए थे, मगर बाद में सारे रुपये डूब गए। अब जिन रिश्तेदारों को सदस्य बनाया था, वह बाकी रुपये मांग रहे हैं।