दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक वकील के खिलाफ अवमानना मामले की सुनवाई करते हुए उसे अपने मकान मालिकों को उपयोग और कब्जे के शुल्क का भुगतान करने के आदेश का पालन न करने पर छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई है।
उच्च न्यायालय की एक अन्य पीठ ने वकील को करीब 32 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया था, लेकिन वकील ने मकान मालिकों को भुगतान नहीं किया। न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने 16 मार्च के अपने फैसले में कहा कि वकील द्वारा अदालत में दी गई माफी बिना शर्त नहीं है, बल्कि इरादतन चूक के परिणामों से बचने के लिए केवल जुबानी कहा है।
अदालत ने यह निर्देश उस संपत्ति के मालिकों द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर दिया है जिसका जिसका इस्तेमाल वकील व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए कर रहा था। वह इसे पेइंग गेस्ट हाउस के तौर पर किराए पर दे रहा था।
अदालत ने कहा, प्रतिवादी राज्य बार काउंसिल के साथ नामांकित कानून स्नातक है और कानून के साथ अच्छी तरह से वाकिफ है। अदालत के आदेशों की बाध्यकारी प्रकृति के बारे में जागरूक होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया के लिए बहुत कम सम्मान दिखाया है। वास्तव में इस अदालत को यह प्रतीत होता है कि प्रतिवादी ने कानून के अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का दुरुपयोग करने का इरादा किया है, जिससे याचिकाकर्ता को विषय संपत्ति के कब्जे के साथ-साथ उपयोग और कब्जे के आरोपों से वंचित किया जा सके।