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Defamation Case: एक्टिविस्ट मेधा पाटकर दोषी करार, 30 मई को सजा पर बहस; वीके सक्सेना से जुड़ा है मामला

Fri, 24 May 2024 07:00 PM IST
अनुज कुमार अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

दिल्ली की एक अदालत ने वीके सक्सेना द्वारा दर्ज कराए गए मानहानि मामले में नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक्टिविस्ट मेधा पाटकर को दोषी ठहराया है। अगर सजा का एलान हुआ तो कम से कम दो साल की सजा हो सकती है।
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वीके सक्सेना - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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अदालत ने शुक्रवार को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता और कार्यकर्ता मेधा पाटकर को 2001 में उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना द्वारा उनके खिलाफ दर्ज कराए गए आपराधिक मानहानि मामले में दोषी ठहराया है। साकेत कोर्ट के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा ने पाटकर को भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 500 के तहत आपराधिक मानहानि के अपराध के लिए दोषी ठहराया।

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सक्सेना ने 2001 में पाटकर के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। उस समय वे अहमदाबाद स्थित एनजीओ नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख थे। सक्सेना ने पाटकर के खिलाफ 25 नवंबर 2000 को देशभक्त का असली चेहरा शीर्षक से एक प्रेस नोट जारी कर उन्हें बदनाम करने का मामला दर्ज कराया था।

प्रेस नोट में पाटकर ने कहा कि हवाला लेन-देन से दुखी वीके सक्सेना खुद मालेगांव आए, एनबीए की तारीफ की और 40 हजार रुपये का चेक दिया। लोक समिति ने भोलेपन से तुरंत रसीद और पत्र भेजा, जो किसी भी चीज से ज्यादा ईमानदारी और अच्छे रिकॉर्ड रखने को दर्शाता है। लेकिन चेक भुनाया नहीं जा सका और बाउंस हो गया। जांच करने पर बैंक ने बताया कि खाता मौजूद ही नहीं है। पाटकर ने कहा कि सक्सेना देशभक्त नहीं बल्कि कायर हैं।
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2001 में शिकायत दर्ज होने के बाद अहमदाबाद की एक एमएम अदालत ने आईपीसी की धारा 500 के तहत अपराध का संज्ञान लिया और सीआरपीसी की धारा 204 के तहत पाटकर के खिलाफ प्रक्रिया जारी की। 3 फरवरी, 2003 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी की एक सीएमएम अदालत को शिकायत मिली।

2011 में पाटकर ने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमे का दावा किया। न्यायाधीश ने कहा कि पाटकर की हरकतें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण थीं, जिसका उद्देश्य सक्सेना की अच्छी छवि को धूमिल करना था और इससे उनकी प्रतिष्ठा और साख को काफी नुकसान पहुंचा है।

अदालत ने कहा कि आरोपी के बयान, जिसमें उसने शिकायतकर्ता को देशभक्त नहीं, बल्कि कायर बताया और हवाला लेनदेन में उसकी संलिप्तता का आरोप लगाया। ये न केवल मानहानिकारक थे, बल्कि नकारात्मक धारणाओं को भड़काने के लिए भी तैयार किए गए थे।

अदालत ने कहा कि इसके अलावा यह आरोप कि शिकायतकर्ता गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रख रहा है, उसकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर सीधा हमला है। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के परिचितों के बीच हुई पूछताछ और संदेह, साथ ही गवाहों द्वारा उजागर की गई धारणा में बदलाव, उसकी प्रतिष्ठा को हुए महत्वपूर्ण नुकसान को रेखांकित करता है। मामले की सुनवाई 30 मई को सजा पर बहस के लिए होगी।

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