चकराता विकासखंड के बौंदूर खत अंतर्गत मानथात में नुणाई मेले का आयोजन किया गया, जिसमें च्यामा, कांडी, गाता, लावड़ी, दथरोटा, मोठी, चुल्टाड, कांडोई, भटाड, छोंठाड़, लाखामंडल, कुन्ना आदि गांव के सैकड़ों लोगों ने शिरकत की। सभी ने पारंपरिक लोकनृत्य का आनंद लिया। कोरोना के चलते इस मेले का आयोजन दो साल बाद किया गया।
सावन माह में भेड़पालकों के घर वापसी के उपलक्ष्य में मानथात स्थित घास के मैदान में सालों से नुणाई मेले मनाने की परंपरा है। मान्यता है कि दूरदराज से लौटे भेड़पालकों के सम्मान में मेले का आयोजन किया जाता था। तब से ग्रामीण इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। जनजातीय क्षेत्र में भी भेड़ पालन विलुप्त होता जा रहा है, लेकिन भेड़पालकों के सम्मान में हर साल मेले का आयोजन होता है। माना जाता है कि खतों के समूह हजारों की संख्या में भेड़ों की टोली को एक साथ ऊंचे पर्वतों में प्रवास के लिए ले जाते थे। तीन से चार महीने के प्रवास के पश्चात सावन के महीने में अपनी भेड़ो को लेकर लौटते थे। बौंदूर खत के स्याणा रजनीश पंवार राजू एवं जिला पंचायत सदस्य मंजू ने बताया कि मानथात नामक स्थान पर भेड़ों को नमक खिलाया जाता था, जिस कारण मेले का नाम नुणाई (भेड़ों को नमक खिलाने की परंपरा) मेला पड़ गया। इस दिन ग्रामीण आटे की मीठी रोटी प्रसाद के रूप में वितरित करते थे। एक-एक टुकड़ा सभी चरवाहों में बांटा जाता था। सभी भेड़ पालक ऊन से बने वस्त्रों को पहनकर लोक संस्कृति पर आधारित गीतों पर झूमते थे।