वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार बताते हैं कि कॉर्बेट में करीब 1300 हाथियों का बसेरा हैं और ये हाथियों का सबसे बड़ा वास स्थल है। यहां के विशाल घास के मैदान हाथियों को आकर्षित करते हैं जो इनका पसंदीदा चारागाह है। इस बार घास के मैदानों को जलाने की वजह से हाथियों का मैदानों की ओर पलायन ज्यादा हुआ। फरवरी में इन घास के मैदानों को चरणबद्ध तरीके से जलाया गया और जब मार्च में नई कोपलें फूटी तो हाथियों का जमावड़ा होना शुरू हो गया जो पिछले कुछ सालों से घास के मैदान नहीं जलाने के कारण ना के बराबर हो गया था। मई-जून में तो पूरे घास के मैदान हाथियों के झुंडों से पटे रहे, जहां पहले गिने चुने ही हाथियों के झुंड दिखाई देते थे।
जंगल के पास से हटने चाहिए अवैध कब्जे
मानवीय जनसंख्या बढ़ने के कारण कॉरिडोर सिकुड़ गए, जिससे हाथी इंसानी बस्तियों के करीब पहुंच गए। तराई क्षेत्र के हाथी रामनगर, कॉर्बेट और कोसी नदी पहुंचकर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 309 का हिस्सा पार करते हैं, जहां तीन हाथी कॉरिडोर-कोटा, चिलकिया-कोटा और दक्षिण पटलिदुन-चिलकिया स्थित हैं। शासन की ओर से आवंटित खत्तों का पुनर्वास और जंगलों के पास अवैध कब्जों को हटाया नहीं जाता तब तक स्थिति जस की तस बनी रहेगी।
मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए हजारों योजनाएं बनती हैं, लेकिन कागजों में ही सिमट कर रह जाती है। ज्यादा ध्यान बजट लाने और उसे ठिकाने लगाने पर रहता है। विभाग को चाहिए कि ऐसे खत्ते और गांव जो जंगल से सटे हैं उनसे कुछ दायरे पर जल स्रोतों को बढ़ाने, प्रचुर मात्रा में बांस और रोहनी के पेड़ हाथियों के भोजन के रूप में लगाए ताकि उनका रुख आबादी की ओर कम हो। हाथियों के प्राकृतिक आवास में सुधार और इनके साथ इंसानी टकराव कम हो। केंद्र और राज्य सरकार को वन्यजीवों की रक्षा के लिए और कठोर कदम उठाने चाहिए।
- दीप रजवार, वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर