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Iजीएसआई के वैज्ञानिकों ने जोशीमठ में भूधंसाव पर प्रस्तुत किया तकनीकी विश्लेषणI
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की ओर से भूस्खलन आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। उद्घाटन करते हुए अपर मुख्य सचिव आनंद वर्धन ने कहा कि भूस्खलन से बचाव के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ कार्ययोजना तैयार करने एवं निर्माण शैली को अपनाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए राज्य सरकार और तकनीकी संस्थानों के बीच समन्वय के साथ काम करने की जरूरत पर बल दिया।
जीएमएस रोड स्थित एक होटल में हुई कार्यशाला में वरिष्ठ वैज्ञानिक योगेंद्र सिंह ने जोशीमठ में पहाड़ धंसने के कारण मकानों में आई दरारों का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि जिन जगहों पर बोल्डर कम थे। वहां कम दरारें आईं। इसका एक कारण दो अलग-अलग तरह के मटेरियल का एक साथ होना था। जमीन धंसने के पीछे एक बड़ा कारण जमीन के भीतर पानी का रिसाव भी रहा। घटना के समय जब जल का स्रोत जमीन के अंदर बहा तो उससे मिट्टी भी बह गई। इसके चलते जमीन के भीतर का हिस्सा खोखला होता गया। इसका असर जमीन और मकानों में दरारों के रूप में देखने को मिला।
सीबीआरआई रुड़की से आए वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो ने खतरों को कम करने के लिए वैज्ञानिक, प्रशासन और कम्युनिटी के तीन स्तर पर काम करने की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध के जरिए जो डाटा जुटाया जाता है, उसे धरातल पर इस्तेमाल करने के लिए सभी स्तरों पर सामूहिक प्रयास नहीं होते हैं। इसके कारण आपदाओं से खतरा और नुकसान बढ़ जाता है। उन्होंने आबादी क्षेत्रों में मकानों की वहन क्षमता को मजबूत करने और भूस्खलन की तीव्रता में कमी लाने के लिए काम करने की बात कही।
इस दौरान वैज्ञानिक नेहा कुमारी, सोनाली गुप्ता, डॉ. सीडी सिंह, यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार, जीएसआई के पूर्व निदेशक डॉ. पीसी नवानी, राजेंद्र कुमार समेत 20 से अधिक संस्थानों से आए प्रतिभागी मौजूद रहे।