इसके लिए यहां करीब 120 साल पुराने खंडहर हो चुके शस्त्रागार को एक लॉक-अप की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। जेल प्रशासन की ओर से हर वीकेंड पर कुछ लोगों को यहां 500 रुपये लेकर ठहराया जाता है। खबरों में इसकी पुष्टि वहां के उप कारागार अधीक्षक भी कर रहे हैं। हालांकि, इस मामले में जब आईजी जेल विमला गुंज्याल से बात की गई तो उन्होंने इसे पूरी तरह निराधार बताया।
कहा कि यह अंधविश्वास है और जेल में इस तरह की किसी व्यवस्था को नहीं किया जा सकता। इसके लिए जेल प्रशासन से दो दिन में रिपोर्ट तलब की है। जाने अनजाने यदि इस तरह की व्यवस्था बनाई गई है तो उसे समाप्त किया जाए। उधर, इस संबंध में उप कारागार अधीक्षक सतीश सुखीजा से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।
खूब खाया जेल का खाना फिर भी काट रहे सजा
कुछ ऐसे पुलिसकर्मी भी हैं जो विभिन्न जुर्म की सजा जेलों में भुगत रहे हैं। बीते दिनों एक मामले में जेल में सजा भुगत रहे पूर्व पुलिसकर्मी फर्लो पर कुछ दिन के लिए बाहर आए। वह भी अपनी इन पुरानी बातों को याद कर यही बताने लगे। कहा कि उन्हें भी यह बताया जाता था कि यदि जेल में खाना खाया जाए या कुछ वक्त बिताया जाए तो जेल जाने के योग समाप्त हो जाते हैं। इसके लिए जब भी वह कभी काम से जेल में जाते थे तो वहां पर खाना भी खाते थे। बावजूद इसके सालों से जेल में सजा भुगत रहे हैं। उनके कोई दोष इस व्यवस्था या मान्यता से समाप्त नहीं हुए।