रैणी गांव में ऋषिगंगा पर बीआरओ की तरफ से बनाए गए अस्थायी पुल से सीमा पर तैनात सेना और आईटीबीपी के जवानों के लिए भी आवागमन कुछ आसान हो गया है। हालांकि वैली ब्रिज नहीं बनने से फिलहाल वाहनों की आवाजाही नहीं हो पा रही है, लेकिन जरूरी सामान लाने और ले जाने में कुछ आसानी हो गई है। इस पुल से हर दिन 300 से 400 लोग आवाजाही कर रहे हैं।
मलारी हाईवे को जोड़ने के लिए बीआरओ ऋषिगंगा पर वैली ब्रिज बना रहा है। इसके लिए एक तरफ से सपोर्ट दीवार बनाई जा चुकी है, जबकि दूसरी तरफ दीवार बनाने का काम चल रहा है। वैली ब्रिज बनने में अभी कुछ समय लग जाएगा और इसको देखते हुए बीआरओ ने अस्थायी पैदल पुल बना दिया है।
अस्थायी पुल बनने से लाता, सुखी, भल्लागांव, तोलमा, फागती, तमक, सुराईटोटा आदि गांवों के साथ ही मलारी में रह रहे सेना और आईटीबीपी के जवानों को भी आवागमन में सुविधा हो गई है। बीआरओ के मजदूरों को भी दूसरी तरफ जाने में अब परेशानी नहीं उठानी पड़ रही है। सेना के मेजर उत्कर्ष शुक्ला का कहना है कि इस पुल से हर दिन 300 से 400 लोग आवाजाही कर रहे हैं। साथ ही गांवों में रोजमर्रा की वस्तुओं को भी इसी पुल से ले जा रहे हैं।
पिछले दिनों चमोली में नीती घाटी में आई आपदा पर वाडिया इंस्टीट्यूट समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीमें मंथन करेंगी। इसके बाद इस तरह की आपदा से निपटने के लिए जरूरी कवायद की जाएगी। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने मंगलवार को देश के तमाम संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ बैठक कर आपदा से जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने वैज्ञानिकों की दो संयुक्त टीमें गठित की हैं। ये टीमें 60 दिनों में रिपोर्ट सौंपेंगी।
वैज्ञानिकों की टीमें ऐसी आपदाओं से निपटने को लेकर भी सुझाव देंगी। एनडीएमए की ओर से आयोजित ऑनलाइन बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि उत्तराखंड सरकार इन टीमों को वैज्ञानिक शोधों के लिए जरूरी सुविधाएं मुहैया कराएगी। बैठक में वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ कालाचांद साईं व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसके राय के अलावा राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रुड़की, आईआईटी रुड़की, एनजीआरई, केंद्रीय जल आयोग, नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन इसरो समेत दर्जन भर संस्थानों के वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया।
बता दें कि पिछले दिनों चमोली के नीती घाटी में आई आपदा में भारी जनहानि हुई थी। साथ ही ऋषि गंगा और धौली गंगा नदियों पर बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी तहस-नहस हो गए थे। इससे करोड़ों का नुकसान हुआ है। आपदा के बाद केंद्र और राज्य सरकार की तमाम एजेंसियां लगातार राहत कार्यों में जुटी हुई हैं।