उत्तराखंड में प्रारंभिक दौर में जब बसासत की शुरुआत हुई थी तभी नागरिकों ने प्रकृति के मिजाज को समझने और उसके अनुरूप जनजीवन चलाने को प्राथमिकता दी थी। यहां तक कि ब्रिटिश शासकों ने भी उन परंपराओं को महत्व दिया, जिससे यहां का पर्यावरण सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रहा, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में स्थापित परंपराओं की जो अनदेखी हुई उसने यहां तमाम आपदाओं को आमंत्रित किया है।
उत्तराखंड में बसासत की शुरुआत रिवर वैली सेटलमेंट के तहत नदियों के तटों पर हुई, लेकिन बागेश्वर, श्रीनगर जैसी तमाम जगहों पर गर्मियों में बहुत गर्मी पड़ने के कारण तत्कालीन समाज ने ठंडी जलवायु की तलाश में टीलों (रिज) का रुख किया। सुरक्षित समझे जाने वाले क्षेत्रों में वर्षों के अध्ययन के बाद पानी वाली जगहों में बसासत से पहले वहां भारी तादाद में उतीस और बांज के वृक्ष रोपित किए गए जो जल को रोकने में सक्षम थे।
इन लोगों के पास क्षेत्र की जैव विविधता और नदियों, झीलों, पर्वतों, ग्लेशियर और उनमें होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों आदि की महत्वपूर्ण जानकारी थी। ब्रिटिश शासकों ने जब यहां विकास कार्य किए तो इसके लिए ईआईए यानी एन्वायरनमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट को आवश्यक रूप से लागू किया। इसके तहत सड़क, विद्युत परियोजना या अन्य निर्माण से पूर्व क्षेत्रीय बुद्धिजीवियों सहित बुजुर्गों और आमजनों के अनुभवों और सुझावों के बाद ही योजनाएं बनाईं गईं। यही कारण है कि ब्रिटिश काल के दौरान बनीं परियोजनाएं अपनी उम्र से से भी अधिक समय तक सुरक्षित रहीं।
पर्यावरणविद और इतिहासकार प्रो. अजय रावत कहते हैं कि आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक ज्ञान और अनुभव की भारी अनदेखी की जा रही है। ईआईए की महत्वपूर्ण प्रथा अंग्रेजों के जाते ही समाप्त हो गई। अब किसी भी राजीनीतिक दल के एजेंडे में पर्यावरण संरक्षण नजर नहीं आता। उनका कहना है कि क्षेत्र विशेष की जरूरत के अनुरूप पौधरोपण नहीं किया जाता। सड़कों के कटान का मलबा नदियों में फेंका जाता है। इससे उनके आसपास की पौध और जलस्रोत नष्ट हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में एक किमी सड़क निर्माण में 40 से 80 हजार क्यूबिक मीटर मलबा उत्पन्न होता है। इसका निस्तारण गैर जिम्मेदाराना तरीके से किया जाता है।
प्राकृतिक बांध या स्पंज हैं बुग्याल, इनकी भी अनदेखी
नैनीताल। हिमालयी क्षेत्र में हलचल होती रहती है, लेकिन इससे पर्यवरण को सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी प्रकृति ने स्वयं कर रखी है। इनमें बुग्याल (अल्पाइन मीडोज) भी शामिल हैं जो एक तरह से प्राकृतिक बांध या स्पंज की तरह कार्य करते हैं। ये अतिवृष्टि होने पर अतिरिक्त जल को समेट कर गर्मी में धीरे-धीरे उसे छोड़ते हैं। प्रो. अजय रावत का कहना है कि बीते दशकों में बुग्यालों से भी भारी छेड़छाड़ और इनमें अतिक्रमण हुआ है जिससे ये क्षेत्र संवेदनशील हो गए हैं।