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चमोली आपदाः ग्लेशियर झीलों से आने वाली आपदा से निपटने के लिए 113 पन्नों की गाइडलाइन तैयार

Mon, 15 Feb 2021 01:09 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अंकित कुमार गर्ग, अमर उजाला, रुड़की
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चमोली आपदा - फोटो : अमर उजाला
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राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) रुड़की के वैज्ञानिकों के सहयोग से नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) ने ग्लेशियर झीलों के फटने से आने वाली तबाही से बचाव के लिए 113 पन्नों की गाइडलाइन तैयार की है।

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इसमें स्विट्जरलैंड की स्विस एजेंसी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दावा है कि यह ग्लेशियर झीलों के फटने से आने वाली आपदा की रोकथाम के लिए भारत में पहली गाइडलाइन है। एनआईएच के वैज्ञानिकों ने इस पर जमीनी तौर पर काम करने की सलाह दी है।
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हाल ही में उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से आई आपदा के कारण जान-माल के भारी नुकसान के बाद इसके रोकथाम का तंत्र विकसित करने पर बहस छिड़ी है। राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने भी हिमालयी क्षेत्रों के ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए तंत्र बनाने पर जोर दिया था।

वहीं, इस संबंध में एनडीएमए की ओर से अक्तूबर 2020 में मैनेजमेंट ऑफ ग्लेशियल लेक आउट बर्स्ट फ्लड्स (ग्लोफ्स) गाइडलाइन का प्रकाशन किया है। इसमें भारतीय हिमालयन क्षेत्र में क्लाइमेट चेंज समेत विभिन्न कारणों के चलते आ रही चुनौतियों के सापेक्ष उठाए जाने वाले तकनीकी एवं गैरतकनीकी तंत्र को विकसित करने की प्रणाली का जिक्र किया गया है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम पर जोर

गाइडलाइन को तैयार करने में एनआईएच रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार जैन और डॉ. एके लोहानी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा स्विट्जरलैंड की स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन (एसडीसी) समेत विभिन्न संस्थाओं के विशेषज्ञों का भी योगदान रहा है।

डॉ. संजय जैन बताते हैं कि गाइडलाइन में दस चैप्टर हैं। इनमें ग्लेशियर झीलों का चिह्नीकरण, खतरे वाली झीलों का चिह्नीकरण, झीलों के खतरों के कारण, आपदारोधी तंत्र का विकास एवं प्रबंधन, ग्लेशियर प्रबंधन की रणनीति, जियोलॉजिकल एवं हाइड्रोलॉजिकल तंत्र का विकास, रिस्क जोन की मैपिंग, विभिन्न तकनीक का विकास एवं उनका धरातल पर उपयोग, खतरनाक झीलों की मॉनिटरिंग आदि पर कदम उठाने की विस्तृत जानकारी दी गई है।

डॉ. संजय जैन का कहना है वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए गाइडलाइन पर जमीनी तौर पर काम करने की जरूरत है। 

गाइडलाइन में ग्लेशियर से आने वाली आपदा के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार करने पर भी जोर दिया गया है। साथ ही इसमें आपदा के समय सूचना तंत्र में स्थानीय स्तर पर डीएम, एसडीएम से लेकर आम लोगों तक एक सूचना तंत्र विकसित करने की भी पूरी जानकारी दी गई है। इसके अलावा तकनीक के जरिये ग्लेशियरों पर अध्ययन एवं खतरों को कम करने की विस्तार से जानकारी दी गई है।
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खतरनाक झीलों का तैयार हो हाइड्रो डायनमिक मॉडल 

ग्लेशियर और झीलों के लिए तैयार गाइडलाइन में वैज्ञानिकों ने खतरनाक ग्लेशियर झीलों का हाइड्रो डायनमिक मॉडल तैयार करने की सिफारिश की है।

डॉ. एके लोहानी ने बताया कि जिन जगहों पर पावर प्रोजेक्ट चल रहे हैं या फिर जिन झीलों की जद में आबादी है, उनमें यह मॉडल तैयार करना ज्यादा जरूरी है। एनआईएच इस मॉडल के जरिये यह बताता है कि झील टूटती है तो इसके पानी का वेग और गहराई कितनी होगी। साथ ही यह कितने समय में कहां तक तबाही मचा सकता है।

झीलों में पानी कम करने की सिफारिश

गाइडलाइन के अनुसार, सबसे पहले हिमालय की सभी झीलों की रोजाना सेटेलाइट और अन्य तकनीक से मॉनिटरिंग हो। इसका हर रोज का डाटा सार्वजनिक हो। जिन जगहों पर ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, वहां फोकस कर बन रही झीलों का पानी कम करने के लिए पंपिंग, टनल एवं अन्य तकनीक को अमल में लाया जाए।

झीलों के टूटने पर आपदा तंत्र के तुरंत एवं सटीक कदम उठाए जाने के लिए अधिकारियों और आपदा प्रबंधन से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण दिया जाए। 
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