इस जंगल को हरा-भरा रखन के लिए आज भी क्षेत्र की महिलाएं आगे रहती हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदा के चलते यह जंगल छिन्न भिन्न होकर रह गया है। ऋषि गंगा के मुहाने पर टूटे ग्लेशियर से नदी ने रौद्र रुप धारण कर रैणी गांव के जंगल को भारी नुकसान पहुंचाया।
अब जंगल के निचले क्षेत्र में भूस्खलन भी सक्रिय हो गया है। रैणी गांव के प्रधान भवान सिंह राणा का कहना है कि ग्रामीणों में आज भी अपने जंगलों को बचाने के लिए जागरुकता थी। चिपको आंदोलन के बाद से ही इस जंगल को एक नई पहचान मिली थी।
कई वन विशेषज्ञ यहां शोध करने पहुंचते थे। लेकिन आज आपदा ने मानवों के साथ ही वनस्पति को भी नहीं छोड़ा। चिपको आंदोलन का साक्षी रैणी गांव का जंगल अब आपदा की भेंट चढ़ गया है। नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क डीएफओ नंदबल्लभ शर्मा का कहना है कि इस जल प्रलय से लगभग 200 हेक्टेयर जंगल बह गया है। यहां केल, सुराई, देवदार, बांज, बुरांस के संरक्षित पेड़ थे। अब जंगल उजाड़ लग रहा है।