अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। संतोपंथ ग्लेशियर में ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ती जा रही है। वर्ष 2011 में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के डा. विजय नायर ने अपने शोध के दौरान यहां ब्लैक कार्बन की मात्रा 190 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर बताई थी।
जब गढ़वाल विवि और आईआईटीएम की संयुक्त टीम ने वर्ष 2016 में अध्ययन शुरू किया, तो ब्लैक कार्बन 199 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर मिला। वर्ष 2019 में यह बढ़कर 208 नैनोग्राम तक पहुंच गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, संतोपंथ में लगातार ब्लैक कार्बन एरोसोल की मात्रा बढ़ती जा रही है। वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान ने भी गंगोत्री ग्लेशियर में अध्ययन किया है। यहां सामान्य तौर पर 10 से 90 नैनोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर ब्लैक कार्बन पाया जाता है। लेकिन जब जंगलों में आग लगती है, तो यह 4 हजार 620 नैनोग्राम तक पहुंच जाता है।
जंगलों की आग और वाहनों व जनरेटरों के ईंधन जलने से ब्लैक कार्बन निकलता है। यह हवा में एक हफ्ते तक उड़ सकता है। वातावरण में उड़ते हुए इसमें धूल के कण भी मिल जाते हैं।
गर्म होने की वजह से यह हवा के साथ ठंडे इलाकों यानी कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उड़कर पहुंच जाते हैं। बाद में यह ग्लेशियर में जमा होते हैं। ब्लैक कार्बन वातावरण से उष्मा का ज्यादा अवशोषण करते हैं, जिससे ग्लेशियरों की पिघलने की रफ्तार बढ़ जाती है।
अत्यधिक मानवीय गतिविधि ग्लेशियरों की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं। आवश्यकता है कि सभी ग्लेशियरों में वायु प्रदूषण के सभी आंकड़े जुटाने के बाद उन्हें साझा किया जाय। यदि योजनाओं के निर्माण में शोध को प्राथमिकता मिले, तो काफी हद तक आपदाओं मेें कमी आएगी।
- डा. आलोक सागर गौतम, सदस्य ब्लैक कार्बन अध्ययन दल