बलवा और मारपीट की धाराएं लगाई गईं
जबकि, दूसरा मुकदमा सुरेंद्र सिंह नेगी की तहरीर पर दर्ज किया गया। सुरेंद्र सिंह नेगी ने तहरीर में लिखा कि शुरुआत में मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल ने उनके साथ गाली गलौज की थी। गंदी गंदी गालियां और धमकी दी गई। इसके बाद धर्मवीर ने अगले घटनाक्रम में पीआरओ कौशल बिजल्वाण व गनर पर मारपीट व गाली गलौज का आरोप लगाया। पुलिस ने इस तहरीर पर भी कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज किया। लेकिन, कौशल बिजल्वाण को ही एफआईआर में आरोपी के तौर पर दर्शाया। इसमें बलवा और मारपीट की धाराएं लगाई गईं।
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एक घटनाक्रम में जब मुकदमा दर्ज होता है तो नियमानुसार तहरीर में आए सभी नामों को पुलिस एफआईआर में आरोपियों के कॉलम में लिखती है। बाकी के नाम जो अज्ञात में यदि होते हैं तो उन्हें जांच के दौरान जोड़ लिया जाता है। अब सवाल है कि क्या पुलिस को अपने स्टाफ के गनर का नाम भी नहीं पता था? मंत्री का नाम शुरुआत में ही एफआईआर में आरोपी के रूप में क्यों नहीं लिखा गया? पत्रकारों ने जब इस स्थिति को साफ करने के लिए एसएसपी दलीप सिंह कुंवर से बात की तो उन्होंने बताया कि एफआईआर शॉर्ट में होती है। मंत्री का नाम भी है। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब जांच शुरू होगी तो क्या मंत्री का नाम आरोपियों में शामिल किया जाएगा या फिर...।