केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश भाजपा की कमान बंशीधर भगत को सौंपकर एक फैसले से कई समीकरण साधे हैं। बंशीधर को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर केंद्रीय नेतृत्व ने साफ संकेत दिया है कि कुमाऊं और गढ़वाल के क्षेत्रीय संतुलन को दरकिनार नहीं किया जा सकता। जातीय समीकरणों का पूरा ख्याल रखा जाएगा। साथ ही यह भी साफ हो गया कि पार्टी पुराने फार्मूले पर चुनावी समर में उतरेगी। अगर मुख्यमंत्री गढ़वाल का ठाकुर होगा, तो प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं का ब्राह्मण ही बनेगा। इससे केंद्र ने इशारा कर दिया कि प्रस्तावित मंत्रिमंडल विस्तार में भी यह फार्मूला इस्तेमाल होगा।
दो साल बाद चुनावी समर में उतरने वाली त्रिवेंद्र सरकार के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने अनुभवी नेता को संगठन की कमान सौंपी है। 69 वर्षीय खांटी भाजपाई बंशीधर भगत के अनुभव पर टीम शाह का भरोसा सभी खेमों के लिए संदेश भी है। क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों की अनदेखी कर चुनाव में उतरने का जोखिम पार्टी नहीं ले सकती। कुमाऊं की राजनीति में इस बात को लेकर कसक है कि सरकार में उनकी हिस्सेदारी कम है। उनका इशारा त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल की ओर है जहां तीन सीट खाली हैं। वित्त मंत्री रहे प्रकाश पंत के निधन के बाद से कैबिनेट में कुमाऊं का प्रतिनिधित्व और कम हो गया।
बेशक उस समय पार्टी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट कुमाऊं के ब्राह्मण नेता थे, लेकिन मंत्रिमंडल में क्षेत्र के वरिष्ठ विधायक अपनी बारी का इंतजार करते आए हैं। इनमें एक चेहरा बंशीधर भगत का भी था, जिनका संगठन में पुनर्वास हो गया है। अब बड़े चेहरे के रूप में बिशन सिंह चुफाल अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन अब तक कैबिनेट में उनकी जगह युवा चेहरे मंत्रिमंडल में आए। अब भगत को संगठन की कमान सौंपने से पुराने नेताओं में और भरोसा बढ़ा है।
मंत्रिमंडल विस्तार में भी रहेगा यही फार्मूला
त्रिवेंद्र मंत्रिमंडल में रिक्त तीन पदों पर जल्द नियुक्ति होनी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाएं बन रही हैं। बनाए जाने वाले नए मंत्रियों के चयन में क्षेत्रीय, जातीय और अनुभव के समीकरणों को तरजीह मिल सकती है। अभी तक गढ़वाल क्षेत्र और ठाकुरों का प्रतिनिधित्व मंत्रिमंडल में अधिक है।
नहीं चली खेमों की, संघ रहा कामयाब
प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व ने किसी भी खेमे को तरजीह नहीं दी। पार्टी ने संघ के सुझाये नाम पर ही मुहर लगाई है। एक खेमा विधायक नवीन दुमका का नाम आगे बढ़ा रहा था तो दूसरा खेमा कैलाश शर्मा के समर्थन में था। इसके अलावा युवा चेहरे के रूप में पुष्कर धामी का नाम आगे बढ़ाया जा रहा था। केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष खेमों की पैरोकारी के बीच संघ ने बंशीधर का नाम सुझाया। भगत के सभी समीकरणों पर मुफीद बैठने पर केंद्र ने उनके नाम पर मुहर लगाई।