3- कम अंक वालों को दाखिला, होनहार परेशान : सीयूईटी में अच्छा स्कोर करने वाले होनहार छात्र आजकल परेशान हैं। उनका कहना है कि इतनी मेहनत से प्रवेश परीक्षा दी, ताकि अच्छे कॉलेज में आसानी से सीट मिल जाए। उनके साथ उन छात्रों को भी दाखिला मिल रहा है, जिन्होंने केवल सीयूईटी में हाजिरी लगाई है, उनके अंक बेहद कम हैं। यानी सीयूईटी की मेरिट का कोई मकसद समझ ही नहीं आया। कई होनहार इस पर सवाल उठा रहे हैं।
4- कॉलेज बना दिए बेगाने : गढ़वाल विवि ने सीयूईटी से दाखिलों की पूरी प्रक्रिया में केवल अपने तीनों परिसरों के लिए ही निर्देश जारी किए हैं। उससे 10 अशासकीय व करीब 52 निजी कॉलेज संबद्ध हैं। इनके लिए विवि ने आज तक कोई निर्देश जारी ही नहीं किए। अलबत्ता, कुछ कॉलेजों ने पत्र लिखकर पूछा कि कैसे दाखिले करने हैं तो विवि प्रशासन ने जवाब दे दिया सीयूईटी से। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने गढ़वाल विवि को सीयूईटी में शामिल हुए छात्रों का पूरा डाटा भेज दिया लेकिन विवि ने किसी भी कॉलेज से इसे साझा नहीं किया। नतीजतन करीब 70 प्रतिशत सीटें ग्रेजुएशन में खाली पड़ी हैं।
5- एनटीए-यूजीसी भी सवालों में : यूजीसी के निर्देशों पर एनटीए ने सीयूईटी कराया है। जब इसकी ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू हुई थी तो इसमें गढ़वाल विवि व इसके परिसरों में चल रहे कोर्सेज की जानकारी तो दी गई लेकिन संबद्ध कॉलेजों की कोई भी सूचना एनटीए की वेबसाइट पर नहीं थी। देशभर के जिन छात्रों ने गढ़वाल विवि का विकल्प चुना होगा, उन्हें संबद्ध कॉलेजों के कोर्स व सीटों की जानकारी ही नहीं मिल पाई। नतीजतन किसी भी कॉलेज तक बाहरी छात्र नहीं पहुंच पाए।
6- शुल्क : सीयूईटी की प्रवेश परीक्षा का शुल्क इतना था, जितने में उत्तराखंड के सरकारी-अशासकीय कॉलेजों में ग्रेजुएशन की एक साल की पढ़ाई हो जाती है। सामान्य वर्ग के लिए सीयूईटी का शुल्क तीन विषयों का 750 रुपये, सात विषयों का 1500 रुपये व 10 विषयों का 1750 रुपये था। डीएवी में बीए की एक साल की फीस 1662 रुपये, बीएससी की एक साल की फीस 1702 रुपये है।
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7- खाली सीटें : यह तो तय हो गया कि इस साल ग्रेजुएशन के सभी दाखिले सीयूईटी से होंगे लेकिन इसके बाद जो सीटें खाली रह जाएंगी, उनका क्या होगा? इस पर गढ़वाल विवि कोई निर्णय नहीं ले पाया है। जिन कॉलेजों में सबसे सस्ती उच्च शिक्षा मिलती है, वहां भी 60 से 70 प्रतिशत सीटें खाली रह गई हैं। सवाल यह भी कि इतने गरीब मेधावी छात्र अब जाएंगे कहां? कोई उनकी जिम्मेदारी लेने को ही तैयार नहीं।