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Dehradun News: दो रुपये का नाश्ता, पांच रुपये का खाना, भर रहा पेट, न आ रहा ‘खजाना’

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I- इतने रुपये में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बाजार में नहीं मिल रही सामग्री
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आंगनबाड़ी केंद्र के बच्चों को सेहतमंद बनाने के लिए सरकार उन्हें दो रुपये का नाश्ता और पांच रुपये का खाना दे रही है। कई आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का दावा है कि इस बजट से उन्हें बाजार में सामग्री नहीं मिल पा रही है। मिलती है तो बच्चों का उससे पेट नहीं भरता। कुक्ड फूड योजना लागू हुई लेकिन कई केंद्रों का अगस्त से बजट भी जारी नहीं हुआ। यही वजह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को खुद से रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।



आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मुताबिक, कुक्ड फूड के लिए इतना कम बजट होने की वजह से राशन का पूरा सामान नहीं मिल पा रहा है। इसीलिए बच्चों के लिए एक दिन का खाना उपलब्ध करवाना भी मुश्किल हो रहा है। सात रुपये प्रति बच्चे की दर से 25 दिन के लिए 175 रुपये की धनराशि माता समिति बैंक में आनी चाहिए। कुक्ड फूड का पैसा भी नियमित नहीं आ रहा है। कई कार्यकर्ताओं ने बताया कि इसके लिए उन्हें अपने रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
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सहसपुर परियोजना स्थित आंगनबाड़ी केंद्र की कार्यकर्ता रजनी गुलेरिया ने बताया कि कुक्ड फूड का अगस्त से अबतक पैसा अबतक नहीं आया है। जबकि, हमें नोटिस भेजा गया है कि अगर बच्चों को खाना बनाकर नहीं खिलाओगी तो जवाब देना होगा।



Iदाल, सब्जी, घी, तेल भी नहीं मिल पा रहाI



उत्तराखंड राज्य आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ की प्रदेश अध्यक्ष सुशीला खत्री ने बताया कि गेहूं और चावल के साथ में दाल भी दी जाती थी लेकिन दिसंबर से दाल आना बंद हो गई। सरकार ने कुक्ड फूड का बजट इतना कम रखा है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उस बजट में बच्चों को पूरा खाना उपलब्ध नहीं करवा पा रही हैं। जबकि, बच्चों के लिए मेन्यू फाइव स्टार होटल जैसा बना दिया गया है। उन्होंने मांग की कि सरकार इतना पैसा दे जिससे दाल, सब्जी, घी और तेल खरीदा जा सके।



Iकरीब 40,000 बच्चे योजना मेंI

जिले में आंगनबाड़ी केंद्र की सात परियोजनाएं हैं। इसमें रायपुर, डोईवाला, विकासनगर, सहसपुर, कालसी, चकराता और देहरादून शहर है। इन सभी परियोजनाओं में छह माह से छह साल तक के 85,000 बच्चे लाभार्थी हैं। हालांकि, कुक्ड फूड का सेवन तीन साल से छह साल की उम्र के बच्चे ही करते हैं। ऐसे में इनकी संख्या भी करीब 40,000 है।I
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Iमिलने वाले गेहूं और चावल को पकाकर बच्चों को खिलाना होता है। जो बजट मिलता है वह सिर्फ तेल, घी और मसालों के लिए दिया जा रहा है। यह भारत सरकार की योजना है और हर जगह इतना ही पैसा जा रहा है। - जितेंद्र कुमार, डीपीओ, बाल विकास एवं महिला सशक्तीकरण विभागI
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