शहर की यातायात व्यवस्था में सबसे बड़ी बाधक यहां की पार्किंग व्यवस्था है। आड़े-तिरछे नो पार्किंग में खड़े होने वाले वाहनों पर पुलिस कार्रवाई तो करती है, मगर इसका असर शहर में नहीं दिखता। नो पार्किंग से वाहन उठाने के लिए पुलिस पीपीपी मोड पर क्रेन भी चलवाती है। क्रेन संचालक लाखों रुपये कमा रहे हैं मगर इस कार्रवाई के बाद भी शहर की स्थिति जस की तस है।
दरअसल, नो पार्किंग में वाहनों पर कार्रवाई करने के लिए इसी साल मार्च में पुलिस ने पीपीपी मोड पर क्रेन संचालकों करार किया था। छह क्रेन संचालकों ने नौ क्रेन को संचालित किया था। इन क्रेन से चौपहिया वाहनों को टो कर संबंधित थाने या ट्रैफिक ऑफिस में खड़ा किया जाता है। संबंधित वाहन मालिक से टो चार्ज के साथ-साथ चालान भी वसूला जाता है।
यह पूरी रकम 1500 रुपये निर्धारित थी। इनमे से 500 रुपये चालान के रूप में सरकारी खजाने में जाती है। जबकि, एक हजार रुपये क्रेन संचालक के होते हैं। इन क्रेन के माध्यम से मार्च से अक्तूबर तक तकरीबन छह हजार से ज्यादा वाहनों को टो किया था। इस हिसाब से इन क्रेन संचालकों ने तो 50 से 60 लाख रुपये कमा लिए। लेकिन शहर की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
हालांकि, अब टो चार्ज को घटाकर 750 रुपये कर दिया गया है। नए टेंडर इसी आधार पर किए गए हैं। लगातार वाहन टो भी किए जा रहे हैं। इसके अलावा हर साल पुलिस कैमरों और ड्रोन से भी नो पार्किंग में चालान करती है। इसी साल काटे गए चालान की बात करें तो इनकी संख्या भी तकरीबन छह हजार से ज्यादा है। बावजूद इसके इस विकराल समस्या का कोई हल नहीं निकल पा रहा है।
प्राइवेट क्रेन से हुए कई विवाद
जब प्राइवेट क्रेन को चलाया गया तो शुरूआत में कई विवाद भी हुए। क्रेन चालक के साथ एक पुलिसकर्मी जरूर बैठा होता है। लेकिन अस्पतालों के बाहर हुई कार्रवाई विवाद का कारण बन गई। चंद मिनट के लिए वाहन बाहर खड़ा कर अंदर गए लोगों के वाहन टो कर लिए जाते थे। कई बार ये विवाद वहीं मौके पर होते थे तो कुछ लोग ट्रैफिक ऑफिस में इस रवैये का विरोध करते थे। हालांकि, अब मौजूदा एसपी ट्रैफिक ने इस मामले में संवेदनशील बनने की हिदायत दी है। लिहाजा अब कुछ दिनों से इस तरह के विवाद सामने नहीं आए हैं।
यहां रहती है क्रेन
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