परिवहन विभाग ई-रिक्शा पर रोक लगाने की तैयारी में है। इसके स्थान पर ई-रिक्शा संचालकों को ऑटो का परमिट देने की तैयारी है। ई-रिक्शा संचालक इसे ज्यादती बता रहे हैं। ई-रिक्शा को फिटनेस के आधार पर एक तय समय सीमा के बाद सड़क से हटाया जाना था। लेकिन पिछले दस सालों में लगातार ई-रिक्शा बढ़ते गए और पुराने रिक्शा नहीं हटे। इससे सड़क पर ई-रिक्शा की भरमार हो गई।
बता दें कि ई-रिक्शा संचालकों को ऑटो का परमिट देने का प्रस्ताव भी आरटीए की बैठक में लाया गया था। हालांकि इस पर सहमति नहीं बन पाई। मंडलायुक्त ने ऑटो संचालकों की सहमति से नया प्रस्ताव बनाकर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। अब ऑटो संचालकों के साथ मिलकर नया प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
उधर ऑटो संचालक भी इस प्रस्ताव के विरोध में हैं। ऑटो यूनियन का कहना है कि अगर ई-रिक्शा हटाकर ऑटो बढ़ाए गए तो उनकी रोजी पर संकट आ जाएगा।
Iपुराने हटते रहें तो नहीं बढ़ेगी संख्याI
दरअसल यह पूरी समस्या ही ई-रिक्शा के पंजीकरण की व्यवस्था को नियंत्रित नहीं करने के कारण उपजी है। कंपनियां अपनी एजेंसी खोलकर बाजार में हजारों की संख्या में ई-रिक्शा बेचती रहीं, लेकिन परिवहन विभाग ने इस पर नियंत्रण नहीं किया। न तो नए ई-रिक्शा को बाजार में आने से रोका गया, न ही उनके पंजीकरण के लिए कोई नीति बनाई गई, न पुराने ई-रिक्शा बाजार से हटाए गए। पुराने के साथ नए ई-रिक्शा भी चलने के कारण बाजार में ई-रिक्शा की भीड़ हो गई। नतीजा है कि पंजीकृत ई-रिक्शा 3000 हैं, तो बाजार में कुल ई-रिक्शा 6000 के पार हैं।
Iजो भी नियम बना वही टूटाI
ई-रिक्शा के लिए नियम भी ऐसे बनाए गए जिनका पालन करना व्यवहारिक नहीं था। यह कहा गया कि दिन में ई-रिक्शा नहीं चलेंगे, इन्हें सिर्फ रात में चलाया जाएगा। यह नियम कतई व्यवहारिक नहीं था। इसलिए इसका पालन भी नहीं हो सका। दूसरा नियम बनाया गया कि ई-रिक्शा को सिर्फ गलियों में चलाया जाएगा, यह भी पालन नहीं कराया जा सका। नियम बने और टूटते गए।
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Iई-रिक्शा पर नियंत्रण करना बेहद जरूरी है। बगैर ई-रिक्शा पर नियंत्रण किए दून में यातायात व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया जा सकता। इसलिए जल्दी प्रस्ताव बनाकर ई-रिक्शा के विकल्प को प्रस्तुत किया जाएगा। -शैलेश तिवारी, आरटीओ, प्रवर्तनI