जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर क्षेत्र में छोटी दिवाली के साथ पांच दिवसीय बूढ़ी दिवाली शुरू हो गई है। पर्व को लेकर छोटे बच्चों और महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। छोटी दीवाली पर नन्हे-मुन्ने बच्चों ने भीमल की लकड़ियों से बनी मशालें (होला) जलाकर दशकों से चली आ रही परंपरा को निभाया। वहीं, पर्व को लेकर स्थानीय बाजारों में खरीदारी के लिए लोगों की जबदरस्त भीड़ उमड़ी रही।
जौनसार बावर की अनूठी लोक संस्कृति विश्व प्रसिद्ध है। बूढ़ी दिवाली उसी लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। मंगलवार को जौनसार बावर के अधिकांश क्षेत्रों में छोटी दिवाली धूमधाम से मनाई गई। विशेष व्यंजन के रूप में धान को पानी में भिगोने के बाद तलकर ओखली में चिवड़े तैयार किए गए। चिवड़े को देवताओं को समर्पित करने के बाद लोगों ने एक दूसरे को प्रसाद के रूप में दिया।
गांव के बच्चे नाचते गाते हुए पंचायती आंगन में पंहुचे और अपने ईष्ट देवी-देवताओं की ढाल करते हुए मंदिरों में माथा टेका। बुधवार को भिरूड़ी मनाई जाएगी। इसकी तैयारी के सामान और गर्म कपड़ों की खरीदारी के लिए लोग स्थानीय बाजारों में पहुंचे। रात को लोगों ने पंचायती आंगन में देवता के नाम पर पारंपरिक जौनसारी वेशभूषा में गीत गाते हुए हारूल नृत्य किया। रात भर गाने और नाचने का दौर चलता रहा।
स्थानीय निवासी चमन सिंह, आरएस चौहान, भारत चौहान, सुरेंद्र सिंह चौहान, चतर सिंह तोमर, नरेंद्र सिंह राय ने बताया कि जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में मनाई जाने वाली बूढ़ी दिवाली क्षेत्र के आराध्य देव चार महासू देवताओं को समर्पित होती है। बताया कि लोग पूरे साल बूढ़ी दिवाली का इंतजार करते हैं।